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कड़ुआ  : वि० [सं० कटुक, प्रा० कडुअ] [भाव० कड़ुआपन, कड़ुआहट, स्त्री० कड़ुई] १. जो स्वाद में अधिक झालदार तथा तीक्ष्ण होने के कारण अप्रिय हो। जो खाने या पीने में असह्य हो। ‘मीठा’ का विपर्याय। जैसे—कड़ई दवा। २. लाक्षणिक अर्थ में, (ऐसी बात) जो अप्रिय तथा कटु हो। जैसे—कड़ुई बात। मुहावरा—(धन) कड़ुआ करना=अनिच्छापूर्वक रुपए खर्च करना या लगाना। जैसे—अब सौ रुपए कड़ुए करो तो काम चले। (किसी से) कड़ुआ पड़ना या होना (क) असंतुष्ट होने पर क्रुद्ध होना। (ख) बुरा बनना। पद—कड़ुए कसैले दिन (क) अकाल, दुर्भिक्ष या रोग के दिन। दुर्दिन। (ख) स्त्रियों के लिए गर्भवती रहने का समय। ३. उग्र या कड़े स्वभाववाला। क्रोधी। पद—कड़ुआ मुँह-वह व्यक्ति जो मुँह से अप्रिय और कड़ी बात निकालता हो। उदाहरण—रहिमन कडुए मुखन को किरियै यही उपाय।—रहीम।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
कड़ुआ तेल  : पुं० [हिं० कड़ुआ+तेल] सरसों का तेल जो बहुत झालदार होता है।
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कड़ुआना  : अ० [हिं० कड़ुआ] १. किसी चीज का कड़ुआ होना। २. कुद्ध या नाराज होना। बिगड़ना। ३. किसी वस्तु की झाल आँखों में लगने पर अथवा अधिक समय तक जागते रहने पर आँखों में चुन-चुनाहट या जलन होना। जैसे—प्याज या मिर्च पीसी जाने पर या रात भर न सोने से आँखें कडुआना।
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कड़ुआहट  : स्त्री० [हिं० कड़ुआ+हट (प्रत्यय)] कड़ुवा होने की अवस्था, गुण या भाव। कड़ुआपन।
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