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कहीं  : अव्य० [हिं० कहाँ] १. ऐसी जगह जिसका कुछ ज्ञान या निश्चय न हो। अनजानी जगह, किसी अज्ञात स्थान पर। जैसे—थोड़ी देर हुई वे कहीं चले गये हैं। पद—कहीं और=किसी दूसरे स्थान पर। जैसे—यह ओषधि यहाँ तो नहीं किन्तु कहीं और अवश्य मिलेगी। २. ऐसा स्थान जिसका स्पष्ट रूप से निरूपण या निर्धारण न किया गया हो। जैसे—यह पुस्तक भी कहीं रख दो। पद—कहीं का=न जाने किस जगह का। (उपेक्षा, तिरस्कार आदि का सूचक। जैसे—पाजी कहीं का। कहीं का कही=एक जगह से हट कर दूसरी जगह बिलकुल अलग या बहुत दूर। जैसे—दो ही वर्षों में नदी कहीं की कहीं चली गई। कही-कही=कुछ अवसरों या स्थानों में। जैसे—कहीं कहीं य़ह भी पाठ मिलता है। कहीं न कहीं=किसी-न-किसी स्थान पर। जैसे—तुझे ढूँढ़ ही लेगे कहीं-न-कहीं।—गीत। मुहावरा— कहीं का न रहना=(क) किसी भी काम या पद के योग्य न रह जाना। (ख) सब तरफ से गया बीता या नगण्य हो जाना। जैसे—आपके फेर में पड़कर हम कहीं के न रहे। ३. किसी अज्ञात परन्तु संभावित अवस्था या दशा में। जैसे—(क) कहीं यह दवा तुमने खा ली होती तो अनर्थ हो जाता। (ख) जल्दी चलो, कहीं गाड़ी निकल न जाय। ४. बहुत अधिक बढ़कर। जैसे—यह उससे कहीं बढ़कर है। ५. (काकु से) कदापि नहीं। कभी नहीं। जैसे—ऐसा कहीं हो सकता है।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
कही  : स्त्री० [हिं० कहना] १. उक्ति। कथन। उदाहरण—कहत न परत कही।—सूर। २. उपदेश, विधि आदि के रूप में कही हुई बात। उदाहरण—एक न लगत कही काहू की, कहति कहति सब हारी।—नारायण स्वामी।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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