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काँप  : पुं० [सं० कल्प, प्रा० कप्प, पा० कप्पो, गु० बँ० काँप, सि० कापु, मरा० काप] १. बाँस आदि को काटकर बनाई जानेवाली पतली तथा लचीली तीली। २. गुड्डो या पतंग में लगाई जानेवाली बाँस की अर्द्धगोलाकार तीली। ३. सूअर का खाँग। ४. हाथी का दाँत। ५. कान में पहनने का एक प्रकार का गहना जिससे प्रायः सारा कान ढक जाता है।
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काँपना  : स० [सं० कंपन] १. शीत आदि के कारण शरीर का रह-रहकर बराबर थोड़ा हिलते रहना। थरथराना। २. क्रोध, भय आदि के कारण शरीर का उक्त प्रकार से हिलना। थर्राना। ३. बहुत अधिक भयभीत होना। जैसे—हम तो उनके सामने जाते काँपते हैं।
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काँपा  : पुं० १. =काँप। २. =कंपा।
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कांपिल  : पुं० [सं० कंपिल+अण्] एक प्राचीन प्रदेश जो किसी समय पांचाल का दक्षिणी भाग था। (आज-कल फर्रूखाबाद के आस-पास)
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कांपिल्य  : पुं० [सं० कम्पिला+ण्य] दे० ‘कांपिल’।
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