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कोढ़  : [सं० कुष्ट० पा० कुट्ठम, प्रा० कठ, कोढ़, गु० कोहोड, कोड, सि० कोरिहो, पं० कोढ़ ने कोर, बँ० कु़, उ० कुडि, मरा० कोढ़, कोड] पित्त बिगड़ने और खून के खराब होनेवाला एक लंबा त्वचा संक्रामक रोग जिसमें शरीर के किसी अंग पर चकते पड़ने लगते है और वह अंग गलने लगता है। (लेप्रसी)। मुहावरा—कोढ़ चूना या टपकना=अँगों का गल कर गिरना। पद—कोढ़ में की खाज=बहुत अधिक दुःख के समय आनेवाला दूसरा कष्ट या विपत्ति।
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कोढ़ा  : पुं० [सं० कोष्ठ, प्रा० कोड्ढ्] खेतमें का वह स्थान जहाँ गोबर आदि एकत्र करने के लिए पशुओं को बाँधते हैं।
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कोढ़िन (ी)  : स्त्री० [हिं० कोढी] १. वह स्त्री जिसे कोढ़ हुआ हो। २. रहस्य संप्रदाय में माया जो मन को शुद्ध नहीं होने देती।
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कोढ़िया  : पुं० [हिं० कोढ़] तंबाकू के पत्तों का एक रोग जिससे उन पर दाग पड़ जाते हैं।
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कोढ़िला  : पुं० [देश०] एक प्रकार का पौधा जिसके मुलायम और हलके डंठलों से दूल्हे को पहनाने के मौर बनाये जाते है।
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कोढ़ी  : पुं० [हिं० कोढ़] [स्त्री० कोढ़िन] १. वह जो कोढ़ रोग से पीड़ित हो। वह जिसे कोढ़ हुआ हो। २. वह जो बहुत आलसी और निकम्मा हो। (व्यंग्य)।
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