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कौड़ी  : स्त्री० [सं० कपर्दिका, प्रा० कवड्डिआ] १. घोंघें की तरह का एक समुद्री कीड़ा जो अस्थिकोश में रहता है। २. उक्त कीड़े का अस्थिकोश जो सबसे कम मूल्य के सिक्के के रूप में चलता था। मुहावरा—कौड़ी का हो जाना=(क) मान-मर्यादा जाते रहना। (ख) परम निर्धन या हीन हो जाना। कौड़ी के तीन होना=बहुत ही तुच्छ या हीन होना। कौड़ी के मोल बिकना=बहुत सस्ता बिकना। कौड़ी को न पूछना=फालतू या बेकार समझकर मुफ्त में भी न लेना। कौड़ी-कौड़ी अदा करना, चुकाना या भरना=लिया हुआ ऋण पूरा-पूरा वापस लौटाना। एक कौड़ी भी बाकी न रखना। कौड़ी-कौड़ी जोड़ना=बहुत ही कष्ट और परिश्रम से धन इकट्ठा करना। कौड़ी फेरा करना या लगाना=जल्दी-जल्दी और बार-बार आते जाते रहना। पद—कौड़ी का=जिसका कुछ भी मूल्य न हो। परम तुच्छ। जैसे—यह कपड़ा कौड़ी काम का नहीं है। कौड़ी-कौड़ी को मुहताज-परम दरिद्र या निर्धन। ३. द्रव्य, धन रुपया पैसा। ४. कर, जो प्राचीन काल में कौड़ियों के रूप में लिया जाता था। ५. काँख, जंघा आदि में उभरने वाली गिल्टी। ६. आँख का डेला। ७. छाती के नीचे बीचोबीच की वह हड्डी जिस पर सबसे नीचे की दोनों पसलियाँ मिलती है। मुहावरा—कौड़ी जलना=भूख या क्रोध से शरीर जलना। ८. कटार की नोक। ९. जहाज का मस्तूल।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
कौड़ी गुड़गुड़  : पुं० [हिं० कौड़ी+गुड़० गुड़] लड़कों का एक प्रकार का खेल।
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कौड़ी जगनमगन  : पुं० =कौड़ी गुड़गुड़।
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कौड़ी जूड़ा  : पुं० [हिं० कौड़ी+जूड़ा] सिर पर पहनने का एक आभूषण। (स्त्रियाँ)।
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