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चरणा  : स्त्री० [सं० चरण+अच्+टाप्] एक रोग जिसमें मैथुन के समय स्त्रियों का रज बहुत जल्दी स्खलित हो जाता है। पुं०[?] काछा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) क्रि० प्र० काछना।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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चरणाक्ष  : पुं० [चरण-अक्षि, ब० स०] अक्षपाद या गौतम ऋषि का एक नाम।
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चरणाद्रि  : पुं० [सं० चरण-अद्रि, ब० स०] १. विंध्य पर्वत की एक शिला (चुनार नगरी के समीर) जिस पर बने चरण चिन्ह को हिंदू बुद्धदेव का और मुसलमान जिसे ‘कदमे रसूल’ बतलाते हैं। २. उत्तर प्रदेश का चुनार नामक स्थान।
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चरणानति  : स्त्री० [चरण-आनति, स० त०] किसी बड़े के चरणों पर झुकना, गिरना या पड़ना।
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चरणानुग  : वि० [चरण-अनुग, ष० त०] १. किसी के चरणों या पदचिन्हों का अनुगमन करनेवाला व्यक्ति। अनुगामी। २. अनुयायी। ३. शरणागत।
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चरणामृत  : पुं० [सं० चरण-अमृत, ष० त०] वह पानी जिसे किसी देवता या महात्मा के चरण धोये गये हों और इसी लिए जो अमृत के समान पूज्य समझ कर पिया जाता हो। २. दूध, दही, घी, चीनी और शहद का वह मिश्रण जिसमें लक्ष्मी, शालिग्राम आदि को स्नान कराया जाता है। और जो उक्त जल की भाँति पवित्र समझकर पिया जाता है। पंचामृत। मुहावरा–चरणामृत लेना=(क) चरणामृत पीना। (ख) बहुत ही थोड़ी मात्रा में कोई तरल पदार्थ पीना।
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चरणायुध  : पुं० [चरण-आयुध, ब० स०] मुरगा जो अपने पैरों के पंजों से लड़ता है।
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चरणार्द्ध  : वि० [चरण-अर्द्ध, ष० त०] चरण अर्थात् चतुर्थाश का आधा (भाग)। पुं० १. किसी चीज का आठवाँ भाग। २. किसी कविता या पद्य के चरण का आधा भाग।
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