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चाँड़  : वि० [सं० चंड] १. उग्र। तीव्र। प्रबल। २. बलवान्। शक्तिशाली। ३. उद्दंड। ४. किसी की तुलना में बढ़कर। श्रेष्ठ। ५. अघाया हुआ। तृप्त। संतुष्ट। ६. चतुर। चालाक। स्त्री० [सं० चंडप्रबल] १. वह वस्तु या रचना जो किसी दूसरी वस्तु विशेषतः छत या दीवार को गिरने या ढहने से रोकने के लिए लगाई या बनायी जाती है। टेक। थूनी। क्रि० प्र०-देना।-लगाना। २. ऐसी प्रबल आवश्यकता या कामना जिसकी पूर्ति तत्काल होने की अभिलाषा हो। ३. उक्त प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मन में होनेवाली आकुलता या बेचैनी। मुहावरा–चाँड़ सरना=उक्त प्रकार की आवश्यकता पूरी हो जाना अथवा उस आवश्यकता की पूर्ति होने पर मन की आकुलता या बेचैनी दूर होना। ४. तीव्रता। प्रबलता। ५. किसी ओर से पड़नेवाला ऐसा दबाव जिसके फलस्वरूप किसी को विवश होकर कोई उद्दिष्ट कार्य करना पड़े। जैसे–जब तक चाँड़ नहीं लगाओगे, तब तक वह तुम्हारा काम नहीं करेगा।
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चाँड़ना  : स० [हिं० चाँड़] १. चाँड़ या टेक लगाना। २. खोदकर उखाड़ना या गिराना। ३. खोदकर गहरा करना। ४. नष्ट-भ्रष्ट करना। उजाड़ना। ५. कसना या दबाना। उदाहरण–माया लोभ मोह है चाँड़े काल नदी की धार।–
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चाँड़िला  : वि० [सं० चंड] [स्त्री० चाँड़िली] १. उग्र। प्रचंड। २. उद्धत। नटखट। शोख। ३. बहुत अधिक।
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चाँड़ी  : स्त्री०=चोंगी या कीप।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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