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परंपरित-रूपक  : पुं० [कर्म० स०] साहित्य में रूपक अलंकार का एक भेद जिसमें एक आरोप किसी दूसरे का कारण बनकर आरोपों की परंपरा बनाता है। यह परंपरा शब्दों के साधारण अर्थ के द्वारा भी स्थापित हो सकती है; और श्लिष्ट शब्दों के द्वारा भी। साधारण अर्थ के आधार पर स्थित परंपरित रूपक का उदाहरण है—बाड़व ज्वाला सोती इस प्रणय-सिंध के तल में। प्यासी मछली सी आँखें थीं विकल रूप के जल में—प्रसाद।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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