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परवाह  : स्त्री० [फा० पर्वा] १. कोई काम (विशेषतः अनुपयुक्त या अनुचित काम) करते समय मन को होनेवाला यह औचित्यपूर्ण विचार कि इस काम से बड़ों के मान को ठेस तो लगेगी। विशेष—यह शब्द इस अर्थ में प्रायः नहिक रूप में ही प्रयुक्त होता है। जैसे—हमें इस बात की परवाह नहीं है। २. आसरा। भरोसा। उदा०—जग में गति जाहि जगत्पति की परवाह सो ताहि कहा नर की।—तुलसी। ३. चिंता। फिक्र। पुं०=प्रवाह।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
परवाहना  : सं० [सं० प्रवाह+हिं० ना (प्रत्य०)] प्रवाहित करना।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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