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फाँस  : स्त्री० [सं० पाश] १. रस्सी में बनाया हुआ वह फंदा जिसमें पशु-पक्षियों को फँसाया जाता है। २. वह रस्सी जिसमें उक्त दृष्टि से फंदा डाला या बनाया गया हो। फाँसा। स्त्री० [सं० पनस] १. बाँस सूखी लकड़ी आदि का सूक्ष्म किन्तु कड़ा तंतु जो त्वचा मे चुभ जाता है। उदाहरण—जैसे मिसिरिहु में मिली निरस बाँस की फाँस।—रहीम। क्रि० प्र०—गड़ना।—चुभना।—निकलना।—लगना। २. लाक्षणिक रूप में, कोई ऐसी अप्रिय बात जो मन में बहुत अधिक खटकती रहे। गाँस। ३. बाँस, बेंत आदि को चीरकर बनायी हुई पतली तीली। पतली कमाची। मुहावरा—फाँस निकालना=मन में होनेवाली खटक दूर होना।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
फाँसना  : स० [सं० पाश, प्रा० फाँस] १. फाँस अर्थात् फंदे में किसी पशु या पक्षी को फँसाना। २. छल, ढंग युक्ति आदि से किसी को इस प्रकार अपने अधिकार या लश में करना कि उससे लाभ उठाया या स्वार्थ सिद्ध किया जा सके। ३. बोलचाल मे किसी को फुसलाकर उससे अनुचित संबंध स्थापित करना।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
फाँसा  : पुं० [हिं० फाँसना] वह लम्बा रस्सा (या रस्सी) जिसके एक सिरे पर फंदा बना होता हैं, और जिसकी सहायता से पशुओं का गला या पैर फँसाकर उन्हें पकड़ा अथवा शत्रु के गले में फँसाकर उन्हें पकड़ा या मारा जाता है। (लैस्सो)।
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फाँसी  : स्त्री० [सं० पाशी] १. फँसाने काफंदा। पाश। २. रस्सी आदि का वह फंदा जिसे लोग अपने गले में फँसाकर आत्महत्या करने के लिए झूल या लटक जाते हैं। क्रि० प्र०—लगाना। ३. पहले देश-द्रोहियों, हत्यारों आदि को दंड देने का एक प्रकार जिसमें दो खम्भों के बीच में एक लम्बा रस्सा बँधा रहता था और रस्से के दूसरे निचले सिरे के फंदे में अपराधी का गला फँसाकर इस प्रकार झटके से उसे नीचे गिरा दिया जाता था कि गला घुटने से वह मर जाता था। मुहावरा—(किसी के लिए) फाँसी खड़ी होना=(क) किसी को फांसी दिये जाने के लिए उसकी तैयारी करना। (ख) प्राणों या संकट उपस्थित होना। जान-जोखिम होना। फाँसी चढ़ाना, लटकाना या देना-उक्त प्रकार का दंड देकर मार डालना। ४. अपराधियों को उक्त प्रकार से दिया जानेवाला प्राण-दंड। ५. कोई ऐसा संकटपूर्ण बंधन जिसमे प्राण जाने का भय हो अथवा प्राण निकलने का सा कष्ट हो। जैसे—प्रेम की फाँसी।
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