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शब्द का अर्थ

बढ़ती  : स्त्री०=बढ़ती। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
बढ़  : वि० [हिं० बढ़ना] १. बढ़ा हुआ। २. अधिक। ज्यादा। ३. मूर्ख। ४. हिं० बढ़ना (क्रि० ) का विशेषण की तरह प्रयुक्त होने वाला संक्षिप्त रूप। स्त्री० १.=बढ़ती। २.=बाढ़।
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बढ़ई  : पुं० [सं० वर्द्धकि० प्रा० वडुइ] १. लकड़ी को छील तथा गढ़कर उसके उपयोगी उपकरण बनानेवाला कारीगर। २. उक्त कारीगरों की एक जाति या वर्ग। ३. रहस्य संप्रदाय में गुरु जो शिष्य रूपी कुन्दे को गढ़-छीलकर सुन्दर मूर्ति का रूप देता है।
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बढ़ई मधु-मक्खी  : स्त्री० [हिं०] एक प्रकार की मधु-मक्खी जिसका रंग काला और पंख नीले होते हैं। यह वृक्षों के काठ तक काट डालती है।
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बढ़ती  : स्त्री० [हिं० बढ़ना+ती (प्रत्यय)] १. बढ़ने, अथवा बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। २. गिनती तौल, नाप मान आदि में उचित या नियत से अधिक या बढ़ा हुआ अंश। ३. धन-धान्य परिवार आदि की वृद्धि। पद—बढ़ती का पहर=उन्नति और समृद्धि के दिन। ४. आवश्यकता, उपभोग, व्यय आदि की पूर्ति हो चुकने पर भी कुछ बच रहने की अवस्था या भाव। बचत। (रसप्लस) ५. मूल्य की वृद्धि। पद—बढ़ती से=अंश-पत्र, राज-ऋण, विनिमय आदि की दर के संबंध मे अंकित या नियत मूल्य की अपेक्षा कुछ अधिक मूल्य पर।
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बढ़ती-फसल  : स्त्री० [हिं०+अ] वह फसल जो अभी खेत में बढ़ रही हो, पर अभी पूरी तरह से तैयार न हुई हो। (ग्रोइंग क्रॉप)।
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बढ़न  : स्त्री० [हिं० बढ़ना] बढ़ने तथा बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। बढ़ती। वृद्धि।
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बढ़ना  : अ० [सं० वर्द्धन, प्रा० वड्ढन] १. आकार, क्षेत्र, विस्तार व्याप्ति सीमा आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जितना या जैसा पहले रहा हो, उससे अधिक होना। जैसे—(क) पेड़-पौधों या बच्चों का बढ़ना। (ख) कर्मचारियों की छुट्टियाँ बढ़ना। (ग) दाढ़ी या नाखूनों का बढ़ना। २. परिमाण, मात्रा, संख्या आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) घर का खर्च बढ़ना। (ख) देश की जन-संख्या बढ़ना। (ग) नदी में जल बढ़ना। ३. कार्य-क्षेत्र, गुण आदि का विस्तार होना। व्याप्ति में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) झगड़ा-तकरार या वैर-विरोध बढ़ना। (ख) प्रभाव-क्षेत्र या व्यापार बढ़ना। ४. तीव्रता, प्रबलता वेग शक्ति आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) किसी चलनेवाली चीज की चाल बढ़ना। (ख) रोग या विकार बढ़ना। ५. किसी प्रकार की उन्नति या तरक्की होना। जैसे—वह तो हमारे देखते-देखते इतना बढ़ा है। ६. आगे की ओर चलना या अग्रसर होना। जैसे—(क) आज-कल औद्योगिक क्षेत्र में अनेक पिछड़े हुए देश आगे बढ़ने लगे हैं। (ख) आका में गुड्डी या पतंग बढ़ना। (ग) तुम्हारें तो पैर ही नहीं बढ़ते। मुहावरा—बढ़ चलना=(क) उन्नति करना। (ख) अपनी योग्यता, सामर्थ्य आदि से अतिरिक्त आचरण या व्यवहार करना। (ग) अभिमान या ऐंठ दिखाना। इतराना। ७. प्रतियोगिता, होड़ आदि में किसी से आगे होना। जैसे—अब यह कई बातों में तुमसे बहुत आगे बढ़ गया है। ८. रोजगार या व्यापार में लाभ के रूप में धन प्राप्त होना। जैसे—चलो इस सौदे में हजार रुपए तो बढ़े।, अर्थात् हजार रुपए की आय या लाभ हुआ। ९. कुछ विशिष्ट प्रसंगों में मंगल-भाषित के रूप में कुछ समय के लिए किसी काम, चीज या बात का अन्त या समाप्ति होना। जैसे—(क) किसी स्त्री के हाथ की चूड़ियाँ बढ़ना, अर्थात् उतारी या तोड़ी जाना। (ख) दीया बढ़ना, अर्थात् बुझाया जाना, दुकान बढ़ना अर्थात् कुछ समय के लिए बन्द होना। स० बढ़ाना। विस्तृत करना। उदाहरण—स्रवन सुनत करुना सरिता भए बढैयो बसन उमंगी।—सूर। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़नी  : स्त्री० [सं० बर्द्धनी, प्रा० बड्ढनी] १. झाड़ू। बुहारी। कूचा। मार्जनी। २. वह अनाज या धन जो किसानों को खेती-बारी आदि के काम पर पेशगी दिया जाता और बाद में कुछ बढ़ाकर लिया जाता है। स्त्री० [हिं० बढ़ना] पेशगी। अग्रिम।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़वाना  : स० [हिं० बढ़ाना का प्रे०] किसी को कुछ बढ़ाने में प्रवृत्त करना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़वारि  : स्त्री०=बढ़ती। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ाना  : स० [हिं० बढ़ाना का स०] १. किसी को बढ़ने में प्रवृत्त करना। ऐसा काम करना जिससे कुछ या कोई बढ़े। २. कोई चीज या बात का विस्तार करते हुए उसे किसी दूर के बिन्दु समय आदि तक ले जाना। विस्तार अधिक करना। जैसे—(क) उपन्यास या कहानी का कथाभाग बढ़ाना। (ख) नौकरी की अवधि या समय बढ़ाना। (ग) धातु को पीटकर उसका तार या पत्तर बढ़ाना। ३. परिमाण, मात्रा, संख्या आदि में अधिकता या वृद्धि करना। जैसे—(क) किसी चीज की दर या भाव बढ़ाना। (ख) किसी का वेतन (या सजा) बढ़ाना। (ग) अपनी आमदनी बढ़ाना। ४. किसी प्रकार की व्याप्ति में विस्तार करना। जैसे—झगड़ा या वात बढ़ाना। कार-बार या रोजगार बढ़ाना। पद—बढ़ा-चढ़ाकर=(क) इतनी अधिकता करके कि अत्युक्ति के क्षेत्र तक जा पहुँचे। जैसे—बढ़ा-चढ़ाकर किसी की प्रशंसा करना या कोई बात कहना। (ख) उत्तेजित या उत्साहित करके। बढ़ावा देकर। जैसे—किसी को बढ़ा-चढ़ाकर किसी के साथ लड़ा देना। ५. जो चीज आगे चल या जा रही हो।, उसेक क्षेत्र गति आदि में अधिकता या वृद्धि करना। जैसे—(क) चलने में कदम या पैर बढ़ाना, अर्थात् जल्दी-जल्दी पर रखते हुए चलना (ख) गुड्डी या पतंग बढ़ाना अर्थात् उसकी डोर या नख इस प्रकार ढीली करना कि वह दूर तक जा पहुँचे। ६. गुण, प्रभाव, शक्ति आदि में किसी प्रकार की तीव्रता या प्रबलता उत्पन्न करना। जैसे—(क) किसी का अधिकार (या मिजाज) बढ़ाना। (ख) अपनी जानकारी या परिचय बढ़ाना। ७. जो चीज जहाँ स्थित हो, उसे वहाँ से आगे बढ़ने में प्रवृत्त करना। जैसे—जूलुस या बारात बढ़ाना। ८. प्रतियोगिता आदि में किसी की तुलना मे आगे ले जाना या श्रेष्ठ बनाना। जैसे—घुड़-दौड़ में घोड़ा आगे बढ़ाना। ९. किसी को यथेष्ठ उन्नत सफल या समृद्ध करना। उदाहरण—सूरदास करूणा-निधान प्रभु जुग जुग भगति बढ़ा दो।—सूर। १॰. कुछ प्रसंगों में मंगल-भाषित के रूप में कुछ समय के लिए किसी काम या चीज का अन्त या समाप्ति करना। जैसे—(क) चूड़ियाँ बढ़ाना-उतारना या तोड़ना। (ख) दीया बढ़ाना-बुझाना। (ग)दुकान बढ़ाना=बन्द करना। अ० खतम या समाप्त होना। बाकी न रह जाना। चुकाना उदाहरण—मेघ सबै जल बरखि बढ़ाने विधि गुन गये सिराई।—सूर।
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बढ़ा-बढ़ी  : स्त्री० [हिं० बढ़ना] १. आचरण, व्यवहार आदि में आवश्यकता या औचित्य से अधिक आगे बढ़ने की क्रिया या भाव। मर्यादा या सीमा का उल्लंघन। जैसे—इस तरह की बढ़ा-बढ़ी ठीक नहीं हैं। २. प्रतिद्वंद्विता। होड़।
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बढ़ार  : पुं० दे० ‘बड़हार’।
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बढ़ाली  : स्त्री० [देश] कटारी। कटार।
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बढ़ाव  : पुं० [हिं० बढ़ना+आव (प्रत्यय)] १. बढ़ने या बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। २. फैलाव। विस्तार। ३. मूल्य आदि की वृद्धि। ४. बढ़ती। बाढ़।
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बढ़ावन  : स्त्री० [हिं० बढ़ावना] गोबर की टिकिया जो बच्चों की नजर झाड़ने के काम में आती है।
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बढ़ावना  : स०=बढ़ाना।
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बढ़ावा  : पुं० [हिं० बढ़ाव] १. आगे बढ़कर कोई महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए किसी को दिया जानेवाला प्रोत्साहन। २. प्रोत्साहित करने के लिए कही जानेवाली बात। क्रि० प्र०—देना।
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बढ़िया  : वि० [हिं० बढ़ना] (पदार्थ) जो गुण, रचना, रूप-रंग सामग्री आदि की दृष्टि से उच्च कोटि का हो। उम्दा। जैसे—बढ़िया कपड़ा, बढ़िया चावल, बढ़िया पुस्तक बढ़िया बात। पुं० १. गन्ने अनाज आदि की फसल का एक रोग जिससे कनखे नहीं निकलते और बढ़ाव बन्द हो जाता है। २. प्रायः डेढ़ नर की एक पुरानी तौल। ३. एक प्रकार का कोल्हू। स्त्री० १. एक प्रकार की दाल। २. जलाशयों आदि की बाढ़।
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बढ़ियार  : वि० [हिं० बढ़ना] (जलाशय या नदी) जिसमें बाढ़-आयी हो। जैसे—बढ़ियार गंगा। स्त्री० नदियों आदि में आनेवाली पानी की बाढ़। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ेल  : स्त्री० [देश] हिमालय पर पाई जानेवाली एक प्रकार की भेड़।
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बढ़ेला  : पुं० [सं० वराह] बनैला सूअर। जंगली सूअर।
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बढ़ैया  : वि० [हिं० बढ़ाना, बढ़ना] १. बढ़ानेवाला। २. उन्नति करनेवाला। वि० [हिं० बढ़ना] बढ़नेवाला। उन्नतिशील। पुं०=बढ़ई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ोत्तरी  : स्त्री० [हिं० बाढ़+उत्तर] १. उत्तरोत्तर होनेवाली वृद्धि। बढ़ती। २. उन्नति। तरक्की। ३. व्यापार में होनेवाला लाभ।
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