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लगना। ३. उतनी भूमि जितनी एक असामी को जोतने-बोने आदि के लिए मिली हो अथवा उसके अधिकार में हो। ४. चमड़े आदि की वह लंबी पट्टियाँ या रस्सियाँ जो घोड़ों, बै  :
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लगंत  : स्त्री० [हिं० लगना+अंत (प्रत्यय)] १. लगने की अवस्था, क्रिया या भाव। २. किसी काम या बात के लिए लगनेवाली धुन। लगन। ३. स्त्री-प्रसंग। संभोग (बाजारू)।
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लग  : स्त्री० [हिं० लगना] १. लगे हुए होने की अवस्था या भाव। २. किसी काम या बात की गहरी धुन। लगन। ३. अनुराग। प्रेम। अव्य० १. निकट। पास। २. तक। पर्यन्त। ३. लिए। वास्ते। ४. साथ। सह।
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लगजिश  : स्त्री० [फा० लग्रजिश] १. फिसलन। २. लड़खड़ाहट। ३. भूल-चूक।
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लगड़-पेंच  : पुं० =दांव-पेंच। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगढग  : अव्य, =लगभग। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगण  : पुं० [सं०] पलक पर होनेवाली एक तरह की गाँठ। पुं०=लग्न। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगदी  : स्त्री० [देश] छोटे बच्चों के गू, मूत्र आदि से सुरक्षित रखने के लिए बिस्तर पर बिछाया जानेवाला कपड़ा।
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लगन  : स्त्री० [हिं० लगना] १. लगने की क्रिया या भाव। २. एकाग्र भाव से किसी काम या बात की ओर ध्यान या मन लगने की अवस्था या भाव। एकान्त ध्यान और प्रवृत्ति की लौ। जैसे—आजकल तो उन्हें कविताएँ लिखने की लगन लगी है, अर्थात् उनका सारा ध्यान कविताएं लिखने की ओर है। उदाहरण—भूखे गरीब दिल की खुदा से लगन न हो। नजीर। ३. श्रृंगारिक क्षेत्र में, प्रगाढ़ प्रेम। बहुत अधिक मुहब्बत। क्रि० प्र०—लगना।—लगाना। पुं० [सं० लग्न] १. विवाह के लिए स्थिर किया हुआ कोई शुभ मुहुर्त या साइत। मुहावरा—लगन धरना या रखना=विवाह का मुहुर्त या समय निश्चित करना। २. वे विशिष्ट दिन और महीने जिनमें हिन्दुओं के यहाँ विवाह होना निश्चित विहित है। सहालग। जैसे—आजकल लगन-बरात के दिन हैं, इसलिए मजदूर कम मिलते हैं। ३. दे० ‘लग्न’। पुं० [फा०] १. ताँबे या पीतल की एक प्रकार की थाली जिसमें रखकर मोमबत्ती जलाई जाती है। २. किसी प्रकार की बड़ी थाली या परात। ३. मुसलमानों में ब्याह की एक रीति जिसमें विवाह से पहले थालियों में मिठाइयाँ आदि भरकर वर के यहाँ भेजी जाती हैं।
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लगन-पत्री  : स्त्री० [सं० लग्न-पत्रिका] कन्या-पक्ष द्वारा वर-पक्षवालों के यहाँ भेजा जानेवाला वह पत्र या लेख जिसमें विवाह संबंधी विभिन्न कृत्यों का समय लिखा होता है।
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लगनवट  : स्त्री० [हिं० लगन] श्रृंगारिक क्षेत्र में किसी के साथ होनेवाला प्रेम-सम्बन्ध।
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लगना  : अ० [सं० लग्न] १. एक पदार्थ के तल या पार्श्व का दूसरे पदार्थ के तल या पार्श्व के साथ आंशिक अथवा पूर्ण रूप से मिलना या सटना। संलग्न होना। सटना। जैसे—(क) किताब की जिल्द पर कपड़ा या कागज लगना। (ख) दीवार पर तसवीरें लगना। (ग) किसी के गले (या पैरों) लगना। २. एक चीज का दूसरी चीज (पर या में) जडा, जोड़ा, टाँका बैठाया रखा या सटाया जाना। जैसे—(क) लिफाके पर टिकट, तसवीर में चौखटा या साड़ी में गोटा लगना। (ख) दीवार में खिड़की या दरवाजा लगना। (ग) मकान में नल या बिजली लगना। (घ) दरवाजे में कुंडी लगना। ३. किसी चीज का उपयोग में आने के लिए यथा स्थान आकर जमना, बैठना या स्थित होना। जैसे—नाव में पाल लगना, बाँश में झंडी लगना। ४. किसी तल पर किसी गाढ़े तरल पदार्थ का लेप आदि के रूप में अथवा यों ही जमाया या पोता जाना। जैसे—पैरों में महावर लगना, दीवारों पर पलस्तर या रंग लगना, चीजों पर निशान लगना, माथे पर तिलक लगना, कपड़ों में कीचड़ लगना। ५. किसी प्रकार की गति की दशा में एक चीज का पासवाली दूसरी चीज से रगड़ खाना या संपृक्त होना। जैसे—(क) यंत्र के पहिए का किसी डंडे या दूसरे पहिए में लगना। (ख) चलते समय घोड़े का पैर लगना, अर्थात् एक पैर का दूसरे से टकराना या रगड़ा खाना। ६. किसी रूप में शामिल या सम्मिलित होना। जैसे—(क) पुस्तक में परिशिष्ट लगना। (ख) कु्त्ते का बिल्ली के पीछे लगना। मुहावरा—(किसी के पीछे या साथ) लग चलना=अनुगामी या संगी साथी बनना। जैसे—तुम्हें तो जिससे कुछ प्राप्ति होगी, उसी के पीछे लग जाओगे। (किसी के पीछे) लगना= किसी का भेद लेने या रहस्य जानने अथवा उसे किसी प्रकार की हानि पहुँचाने के लिए छिपकर उसके पीछे चलना। पीछा करना। जैसे—आजकल पुलिस उनके पीछे लगी है। ७. किसी अनिष्ट या कष्टदायक तत्त्व, या बात का किसी के साथ संबद्ध या संलग्न होना। जैसे—क) किसी के पीछे कोई आफत या जहमत लगना। (ख) किसी को रोग या लू लगना। (ग) भूत या प्रेत लगना। मुहावरा—लगी लिपटी बात कहना=ऐसी बात कहना जो अप्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी दूसरी बात के साथ संबद्ध हो। अस्पष्ट और भ्रामक या द्वयर्थक बात कहना। ८. आवरण, निरोध आदि के रूप में रहनेवाली चीज या उसके विभागों का इस प्रकार आकर कहीं गिरना, बैठना या सटना कि उसके नीचे या पीछे की चीज छिप या ढक जाय अथवा बंद हो जाय। आवरण का आकर यथा स्थान बैठना। जैसे—दरवाजे के किवाड़ या कुंडी लगना, आँख की पलकें या संदूक का ढक्कन लगना (बंद होना)। ९. किसी काम, चीज या बात का व्यक्ति का ऐसे स्थान पर पहुँचना या ऐसी स्थिति में आना कि उसका उपयोग, परिणाम, सार्थकता या सिद्धि हो सके। जैसे—(क) काम ठिकाने या पार लगना। (ख) डाकखाने में पारसल या रजिस्ट्री लगना। (ग) खाने पीने की चीजों का अंग लगना (अर्थात् शरीर को पुष्ट करना)। १॰. किसी चीज का ऐसे क्रम या रूप में आना या प्रस्तुत होना कि उसका नियमित और यथोचित उपयोग हो सके। जैसे—(क) दूकान या बाजार लगना। (ख) कमरे में मेज-कुर्सी या गद्दी, तकिया बिछौना आदि लगना। (ग) पान या उसके बीड़े लगना। ११. किसी चीज का अनिवार्य या आश्यक रूप से उपयोग में आते हुए व्यय होना। काम में आकर समाप्त होना। जैसे—(क) इस काम में १00 (या दो महीने) लगेगे। (ख) इस पुस्तक की ५00 प्रतियाँ तो सरकार में ही लग जायँगी। (ग) दोनों मकान कर्ज चुकाने में लग गये। १२. व्यक्ति का कार्य में लगकर उसका संपादन करना। जैसे—सबेरा होते ही वह अपने काम में लग जाता है। पद—लगकर=अच्छी और पूरी तरह से। खूब मन लगाकर। जैसे—लगकर इलाज करोगे तभी तुम अच्छे होगे। १३. किसी काम या पद पर नियुक्त या नियोजित होना। कर्तव्य से संबद्ध होना। जैसे—(क) किसी का काम या नौकरी लगना। (ख) किसी जगह चौकी या पहरा लगना। १४. किसी प्रकार के आघात या प्रहार की चोट या वार का किसी अंग, शरीर या स्थान पर पडना। जैसे—(क) गोली, ०थप्पड़ मुक्का या लाठी लगना। (ख) मन में किसी की बात लगना। मुहावरा—लगती हुई बात कहना=ऐसी बात कहना जिससे किसी के मन पर आघात हो या चोट लगे। मर्म-भेदी बात कहना। जैसे—चार आदमियों के सामने इस तरह की लगती हुई बात नही कहनी चाहिए। १५. धारदार या नुकीली चीज की धार या नोक शरीर में गड़ना, चुभना या धँसना। जैसे—(क) हजामत बनाते समय गाल पर उत्सरा लगना। (ख) पैर में काँटा लगना। (ग) जानवर का दाँत या नाखून लगना। १६. किसी चीज या बात का प्रयुक्त होने पर अपना ठीक और पूरा काम करना अथवा प्रभाव या फल दिखलाना। जैसे—(क) इस बीमारी में कोई दवा लगती ही नहीं। (ख)यह ताली इस ताले में लग जायगी। १७. किसी के साथ इस प्रकार की बातचीत या व्यवहार करना कि वह कुढ़े या चिढ़े अथवा लड़ने पर उतारु हो । छेड़खानी या छेड़छाड़ करना। जैसे—किसी बड़े के साथ उद्दंडता या धृष्टता की बातें करना। अश्लीलता की और बढ़-बढ़कर बातें करना। जैसे—यह नौकर घर-भर के मुँह लगा है, अर्थात् सबसे बढ़-बढ़कर बातें करता है। १८. किसी ऐसे काम, चीज या बात का संबंध का आरम्भ होना जो कुछ अधिक समय तक निरंतर चलता या बना रहे। जैसे—(क) कचहरी, दरबार या मेला लगना। (ख) नया महीना या साल लगना। (ग)किसी काम या बात की आदत या चस्का लगना। (घ) किसी से प्रेम, लड़ाई-झगड़ा या होड़ लगना। मुहावरा—(किसी से) लगी होना=पहले से चले आनेवाले उक्त प्रकार के कार्य या संबंध का बराबर पूर्ववत् चलते रहना। जैसे—उन दोनों में बहुत दिनों से लगी हैं (अर्थात् उसमें प्रेम, लडाई, होड़ आदि का भाव बराबर चला आ रहा है)। १९. किसी विषय में या किसी व्यक्ति पर किसी चीज या बात का आरोप या प्रयोग होना। जैसे—(क) किसी पर कोई अभियोग या कलंक लगना। (ख) किसी अपराध में कोई धारा या किसी विषय में कोई नियम लगना। (ग) एक के दोष के लिए दूसरे का नाम लगना। २॰. लाक्षणिक रूप में और मुख्यतः धार्मिक क्षेत्र में कोई अनिष्ट बात या स्थिति अनिवार्य रूप से किसी के जिम्मे पड़ना या होना। निश्चित रूप से किसी अनिष्ट या असद् बात का भागी बनना या होना। जैसे—दोष, पाप, , सूतक या हत्या लगना। २१. किसी काम चीज या बात की किसी रूप में मानसिक या शारीरिक अनुभूति या प्रतीति होना। जान पडना। जैसे—(क) गरमी, जाड़ा या डर लगना। (ख) खाने-पीने की चीज का खट्टा या मीठा लगना। (ग) किसी आदमी, काम, चीज या बात का अच्छा या बुरा लगना। २२. किसी प्रकार की मानसिक वृत्ति का दृढ़ता या स्थिरतापूर्वक किसी ओर प्रवृत्त होना। जैसे—(क) काम में जी या मन लगना। (ख) ईश्वर का ध्यान लगना। (ग) घर पहुँचने की चिंता लगना। २३. किसी काम या बात का क्रियात्मक रूप धारण करना या घटित होना। जैसे—ग्रहण लगना, ढेर लगना, देर लगना, नैवेद्य लगना, समाधि लगना, सेंध लगना। २४. किसी प्रकार की क्रिया की पूर्णता, सिद्धि या स्थापना होना। जैसे—बाजी या शर्त लगना, क्रम या सिलसिला लगना। २५. किसी प्रकार के उपयोग या व्यवहार के लिए अपेक्षित या आवश्यक होना० जैसे—(क) इस महीने घर में दो मन अनाज लगेगा। (ख) यह पुस्तक शास्त्री परीक्षा के पाठ्य-क्रम में लगी है। (ग) जब काम लगे तब आकर यह सामान ले जाना। २६. पारिवारिक संबंध या रिश्ते के विचार से किसी रूप में किसी के साथ संबद्ध होना। जैसे—वह भी रिश्ते में हमारे भाई ही लगते हैं। २७. लिखने-पढ़ने के क्षेत्र में, किसी पद, वाक्य या शब्द का ठीक-ठीक अर्थ या आशय समझ में आना। जैसे—किसी चौपाई या श्वोक का अर्थ लगना। २८. गणित के क्षेत्र में कोई क्रिया ठीक और पूरी उतरना। ठीक तरह से हिसाब होना। जैसे—जोड़ या बाकी लगना। २९. आर्थिक क्षेत्र में अनिवार्य रूप से किसी प्रकार का दातव्य या देन निश्चित होना अथवा हिस्से लगना। जैसे—(क) कर, जुरमाना या महमूल लगना। (ख) उधार लिए हुए रुपयों पर सूद लगना। (ग) रोजगार में दाँव पर रुपए लगना। ३॰. यानों, सवारियों आदि के संबंध में किसी स्थान पर आकर टिकना, ठहरना या रुकना। जैसे—(क) किनारे पर नाव या जहाज लगना। (ख) दरवाजे पर गाड़ी या पालकी लगना। (ग) प्लेटफार्म पर इंजन या रेलगाड़ी के डिब्बे लगना। ३१. जहाजों, नावों आदि के संबंध में चलते समय छिछले पानी में नीचे की जमीन या तल के साथ इस प्रकार उनका पेंदा टिकना या सटना कि उनकी गति रुक जाय। टिकना। जैसे—रास्ते में पानी छिछला होने के कारण नाव कई जगह लग गई। ३२. वनस्पतियों आदि के संबंध में उनके आवश्यक अंग अंकुरित या प्रस्फुटित होना। जैसे—फल०फूल या मंजरी लगना। ३३. पेड़-पौधों आदि के संबंध में किसी स्थान पर जमकर जीवित रहना और फलना-फूलना। जैसे—(क) कहीं से आया हुआ पेड़ बगीचे में लगना० (ख) क्यारी में गुलाब की कलमें लगना। ३४. सेंद्रिय पदार्थों के संबंध में किसी प्रकार के दबाव, रोग विकार संघर्ष आदि के कारण सडायँध उत्पन्न होना। गलने या लड़ने की क्रिया का आरंभ होना। जैसे—(क) घोड़े की पीठ या बैल का कंधा लगना, अर्थात् उसमें घाव होना। (ख) बरसात में पड़े-पड़े फलों का लगना, अर्थात् उनका सड़ना आरम्भ होना। ३५. किसी पदार्थ में ऐसा रासायनिक विकार उत्पन्न होना जिससे उसकी आयु तथा शक्ति दिन पर दिन क्षीण होने लगती है। जैसे—(क) दीवार में नोना लगना। (ख) लोहे में जंग या मोरचा लगना। ३६. किसी पदार्थ में ऐसे कीडे आदि उत्पन्न होना या बाहर से आकर सम्मिलित होना जो उस चीज का खाकर या और किसी प्रकार नष्ट करते हों। जैसे—(क) लकड़ी में घुन या दीमक लगना। (ख) ऊनी या रेशमी कपड़ों में कीड़े लगना। ग) गुड़ में च्यूँटे या मिठाई में च्यूँटियाँ लगना। ३७. खाद्य पदार्थों के संबंध में, कडी आँच पाने या जल आदि कम होने के कारण उबाले या पकाये जाने वाले पदार्थ का कुछ अंश बरतन के पेदें में जम, चिपक या सट जाना। जैसे—हलुआ चलाते रहो, नहीं तो लग जायगा। ३८. गौ, भैस बकरी आदि दूध देनेवाले पशुओं का दुहा जाना। जैसे—यह भैस दिन भर में तीन बार लगती है। ३९. आक्रामक या घातक जीवों, व्यक्तियों आदि का प्रायः स्थान विशेष पर आते रहना और चोट करना, अथवा कष्ट या हानि पहुँचना। जैसे—(क) इस रास्ते में डाकू लगते हैं। (ख) इस जंगल में भालू (या शेर) लगते हैं। (ग) छत पर (या बगीचे में) मच्छर लगते हैं। ४0०किसी चीज या दाम का भाव आँका जाना। मूल्यांकन होना। जैसे—इस अँगूठी का बाजार में जो दाम लगे, वह मुझे दे देना। ४१. स्त्री के साथ प्रसंग, मैथुन या संभोग करना। (बाजारू)। विशेष—(क) इस क्रिया का प्रयोग बहुत सी संज्ञाओं और क्रियाओं के साथ अलग अलग प्रकार के अर्थों में होता है। और इसीलिए तात्त्विक दृष्टि से ऐसे प्रयोगों की गणना मुहा०में होती है। जैसे—किसी चीज पर दाँत या निगाह लगना, किसी काम या चीज में हाथ लगना, कोई चीज हाथ लगना आदि। (ख) अनेक अवसरों पर यह क्रिया दूसरी क्रियाओंे के संयो० क्रि० वे रूप में भी लगकर अनेक प्रकार के अर्थ देती है। अधिकतर ऐसे अवसरों पर इसका प्रयोग यह सूचित करता है कि किसी ऐसी क्रिया का आरंभ हुआ है जो अभी कुछ समय तक चलती या होती रहेगी। जैसे—(क) कुछ कहने, पढ़ने, बोलने या लिखने लगना। (ख) चलने, दौड़ने या भागने लगना। (ग) झगड़ने या लड़ने लगना आदि।
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लगनि  : स्त्री० =लगन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगनी  : स्त्री० [फा० लगन] १. छोटी थाली। तश्तरी। रिकाबी। २. पानदान के अन्दर की पान रखने की छोटी तश्तरी।
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लगनीय  : वि० [सं०√लग् (मिलना)+अनीयर्] जो संबद्ध या संयुक्त किया जा सके। लगाये जाने के योग्य।
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लग-भग  : अव्य० [हिं० लग+अनु० भग] मान, संख्या समय आदि की अनुमानित अवधि या मात्रा बहुत कुछ निश्चित भाव से द्योतित करनेवाला अव्यय। जैसे—(क) इस काम में लगभग सौ रुपये लगेगे। (ख) वे वहाँ लगभग चार महीने रहे।
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लगमात  : स्त्री० =लगमात्रा।
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लगमात्रा  : स्त्री० [हिं० लगना+सं० मात्रा] स्वरों के वे चिन्ह जो उच्चारण के लिए व्यंजनों में जोड़े जाते हैं। जैसे—ए का ओ का। पुं० १. वह जो किसी के साथ उक्त प्रकार से प्रायः या सदा लगा रहता हो। २. स्त्री का उपपति। यार। (परिहास या व्यंग्य) उदाहरण—अच्छे ही किये ढूँढ़े के पैदा ये दुगाना। लगमात्रे दोनों है तरहदार हमारे।—जान साहब।
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लगर  : पं०=लग्घड़ (शिकारी पक्षी)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लग-लग  : स्त्री० [हिं० लगना] १. किसी प्रकार की लगावट या आरंभिक या हलका रूप। २. किसी प्रकार के संबंध की ऐसी बातचीज जो अभी चल रही हो। जैसे—उनके लड़के का अभी ब्याह तो नहीं हुआ है पर लग-लग लगी है, अर्थात् बात-चीत चल रही है। वि० [अव्य० लकलक] १. बहुत दुबला-पतला। २. कोमल। सुकुमार।
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लगव  : वि० =लगो (झूठ)।
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लगवाना  : स० [हिं० लगाना का प्रे०] १. किसी को कुछ लगाने में प्रवृत्त करना। २. संभोग करना (बाजारू)।
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लगवार  : पुं० [हिं० लगना=प्रसंग करना+वार (प्रत्यय)] स्त्री का उपपति। यार। आशना।
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लगवीयत  : स्त्री० [अ० लग्व्निवयत] बेहूदगी।
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लगहर  : पुं० [हिं० लाग+हर (प्रत्यय)] ऐसा काँटा या तराजू जिसमें पासंग हो और इसीलिए जिससे तौलने पर चीज अपेक्षया कम तुलती हो।
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लगा  : पुं० [हिं० लगना] किसी के साथ लगा रहनेवाला, और फलतः तुच्छ या हीन व्यक्ति (बाजारू)। जैसे—लगे की मूँछे, उखड़वाऊँगी। (स्त्रियाँ)
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लगाई  : पुं० [हिं० लगना] १. लगने या लगने लगे की अवस्था भाव या मजदूरी। २. इधर की बात उधर लगाने की क्रिया या भाव।
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लगाई-बुझाई  : स्त्री० [हिं० लगाना+बुझाना] कहीं झगड़ा खड़ा करना और फिर इधर-उधर की बातें करके उसे शान्त करने का प्रयत्न करना।
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लगाई-लुतरी  : स्त्री० [हिं० लगाना+लुतरा] आपस में झगड़ा कराने के लिए झूठी-सच्ची बातें इधर-उधर करते फिरना।
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लगाऊ  : वि० [हिं० लगाना] लगानेवाला।
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लगातार  : अव्य० [हिं० लगना+तार=सिलसिला] बराबर एक के बाद एक। सिलसिलेवार। निरंतर। सतत। जैसे—वह दिन भर लगातार काम करता रहा।
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लगान  : स्त्री० [हिं० लगना या लगाना] १. लगने या लगाने की क्रिया या भाव। २. किसी के साथ लगे या सटे हुए होने की अवस्था या भाव। लाग। जैसे—इस मकान में बगल वाले मकान से लगान पड़ती है। ३. वह स्थान जहाँ मजदूर आदि सुस्ताने के लिए अपने सिर पर का बोझ उतार कर रखते हैं। टिकान। ४. वह स्थान जहाँ नावें आकर ठहरती हैं और मल्लाह विश्राम करते हैं। ५. किसी की टोह में उसके पीछे लगने की क्रिया या भाव। जैसे—उसके पीछे तो पुलिस की लगान लगी है। ६. भूमि पर लगनेवाला वह कर जो खेतिहरों की ओर से जमींदार या सरकार को मिलता है। राजस्व। भूकर। जमाबंदी। पोत। विशेष—इस अन्तिम अर्थ में यह शब्द अधिकतर पुं० रूप में ही प्रयुक्त होता दिखाई देता है।
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लगाना  : स० [हिं० लगना का स०] १. एक पदार्थ के तल या पार्श्व को दूसरे पदार्थ के तल या पार्श्व के पास इस प्रकार पहुँचाना कि वह आंशिक या पूर्ण रूप से उसके साथ मिल या सट जाय। संलग्न करना। सटाना। जैसे—पुस्तक पर जिल्द या दीवार पर कागज लगाना। २. एक चीज को दूसरी चीज पर जोडऩा, टाँकना, बैठाना या रखना। जैसे—(क) तस्वीर पर या दरवाजे पर शीशा लगाना। (ख) टोपी या पगड़ी कलंगी लगाना। (ग) घड़ी में नया पुरजा या नई सूई लगाना। ३. कोई चीज ठीक तरह से काम में लाने के लिए उसे यथास्थान खड़ा या स्थित करना। जैसे—(क) जहाज या नाव में पाल लगाना। (ख) दरवाजे के आगे परदा लगाना। ४. किसी तल पर कोई गाढ़ा तरल पदार्थ, पोतना या फेरना या मलना। लेप करना। जैसे—(क) खिड़कियों या दरवाजों में रंग लगाना। (ख) पैरों या हाथों में मेंहदी लगाना। (ग) शरीर के किसी अंग में तेल या दवा लगाना। (घ) जूते पर पालिश लगाना। ५. किसी रूप में कोई चीज किसी के पीछे या साथ सम्मिलित करना। जैसे—पुस्तक में कोई अनुक्रमणिका या परिशिष्ट लगाना। ६. किसी व्यक्ति का भेद लेने या उससे कोई उद्देश्य सिद्ध कराने के लिए किसी को उसके पीछे या साथ नियुक्त करना। जैसे—क) किसी के पीछे जासूस लगाना। (ख) किसी से कोई काम कराने लिए उसके पीछे आदमी लगाना। ७. कोई अनिष्ट या कष्टदायक तत्त्व या बात किसी के साथ संबद्ध या संलग्न करना। जैसे—(क) किसी के पीछे कोई आफत या मुकदमा लगाना। (ख) किसी को कोई बुरी आदत या व्यसन लगाना। ८. आवरण, निरोधन आदि के रूप में काम में आनेवाली चीज इस प्रकार यथा स्थान बैठाना कि उससे रुकावट हो सके। जैसे—(क) कमरे के किवाड़ या दरवाजे लगाना अर्थात् कमरा बन्द करना। (ख) डिबिया या संदूक का ढक्कन लगाना अर्थात् डिबिया का संदूक बन्द करना। ९. किसी काम, चीज या बात या व्यक्त को ऐसे स्थान या स्थिति में पहुँचाना या लाना कि उसका ठीक, उपयोग सार्थकता या सिद्धि हो सके। जैसे—(क) नाव किनारे पर या पार लगाना। (ख) मनीआर्डर या रजिस्ट्री लगाना। (ग) किसी आदमी को काम या नौकरी पर लगाना। १॰. चीज (या चीजें) ऐसे क्रम से या रूप में रखना कि नियमित रूप से उसका यथोचित्त उपयोग हो सके। जैसे—(क) आलमारी में किताबें या फर्श पर गद्दी-तकिया लगाना। (ख) पंगत के आगे पत्तल लगाना। (ग) दूकान या बिस्तर लगाना। ११. किसी पदार्थ का उपभोग करने के लिए उसे ठीक स्थान पर रखना। जैसे—(क) सिर पर टोपी या पगड़ी लगाना। (ख) सहारे के लिए पीठ के पीछे या हाथ के नीचे तकिया लगाना। १२. कोई चीज या उसके उपकरण किसी विशिष्ट क्रम या विधान से यथा स्थान स्थित करना जैसे—(क) पुस्तकों का क्रम लगाना। (ख) बीड़ा लगाने के लिए पान लगाना, अर्थात् पान पर कत्था, चूना आदि रखकर उसे मोड़ना। १३. किसी चीज का उपयोग करते हुए उसका व्यय करना। जैसे—(क) ब्याह शादी में रुपये लगाना। (ख) काम में समय लगाना। (ग) काम करने में देर लगाना, अर्थात् अधिक समय व्यय करना। १४. किसी को किसी कर्तव्य, कार्य, पद आदि पर नियुक्त या नियोजित करना। मुकरर करना। जैसे—(क) किसी जगह पर पहरा लगाना। (ख) किसी को काम या नौकरी पर लगाना। १५. आघात या प्रहार करने के लिए अस्त्र, शस्त्र आदि उद्दिष्ट स्थान पर पहुँचाना। जैसे—(क) किसी को थप्पड़ या मुक्का लगाना। (ख) किसी पर गोली का निशाना लगाना। (ग) किसी चीज पर दाँत या नाखून लगाना। १६. कोई कार्य पूरा करने के लिए किसी प्रकार के उपकरण या साधन का उपयोग या प्रयोग करना। जैसे—(क) कमरा बन्द करने के लिए किवाड़ कुंडी या सिटकिनी लगाना। (ख) दरवाजे में ताला या ताले में ताली लगाना। १७. किसी की कोई झूठी-सच्ची निन्दा की बात किसी दूसरे से जाकर कहना। कान भरना। जैसे—इधर की बात उधर लगाना। पद—लगाना-बुझाना=आपस में लोगों को लडाना या फिर समझा बुझा कर शांत करना। १८. किसी प्रकार का कार्य या व्यवहार आरंभ करना। जैसे—(क) किसी को किसी बात की आदत या चसका लगाना। (ग) भाई भाई में झगड़ा लगाना। मुहावरा—(किसी को) मुँह लगाना=किसी के साथ इतनी नरमी या रियायत का व्यवहार करना कि वह अशालीनता की उद्दंतापूर्ण या दृष्टता की बातें और व्यवहार करने लगे। जैसे—नौकरों को बहुत मुँह लगाना ठीक नहीं है। १९. किसी विषय में या व्यक्ति पर किसी चीज या बात का आरोप करना। जैसे—(क) किसी पर अभियोग या दोष लगाना। (ख) किसी विषय में कोई धारा या नियम लगाना। (ग) स्वयं काम बिगाड़कर दूसरे का नाम लगाना। २॰. किसी प्रकार की शारीरिक अनुभूति कराना या अपेक्षा उत्पन्न करना। जैसे—किसी दवा का प्यास या भूख लगाना। २१. मानसिक वृत्ति को किसी ओर ठीक तरह से प्रवृत्त करना। जैसे—(क) किसी काम या बात में मन लगाना। (ख) पूजन या भजन में ध्यान लगाना। (ग) आसन या समाधि लगाना। २२. किसी काम या बात को क्रियात्मक रूप देना। घटित करना। जैसे—(क) कपडों या किताबों का ढेर लगाना। (ख) किसी का दाह-कर्म करने के लिए चिता लगाना अथवा चिता में आग लगाना। (ग) देर, बाजी या शर्त लगाना। (घ) नैवेद्य या भोग लगाना। २३. किसी पद, वाक्य या शब्द का अर्थ या आशय समझकर स्थिर करना। जैसे—(क) चौपाई या श्लोक का अर्थ लगाना। (ख) किसी की बातों का कुछ का कुछ अर्थ लगाना। २४. गणित की कोई क्रिया ठीक तरह से पूरी या सम्पन्न करना। जैसे—जोड़, बाकी या हिसाब लगाना। २५. किसी पर कोई दायित्व या देन नियत या स्थिर करना जैसे—(क) कर या जुरमाना लगाना। (ख) किसी के जिम्मे कर्ज या देन लगाना। २६. यान या सवारी किसी स्थान पर टिकाना, ठहराना या रोकना। जैसे—बंदरगाह में जहाज लगाना। २७. पेड़, पौधे बीज आदि भूमि में इस प्रकार स्थापित करना कि वे जम या लगकर बढ़े और फूले-फलें। जैसे—बगीचे में आम या गुलाब लगाना। २८. गौएँ, भैसें आदि दुहना। जैसे—यही ग्वाला मुहल्ले भर की गौएँ लगाता है। २९. कोई चीज देखकर लेने के लिए उसका दाम या भाव कहना या निश्चित करना। मूल्यांकन करना। जैसे—मैने तो उस मकान का दाम दस हजार लगाया है। ३॰. यंत्रों आदि के संबंध में कल-पुरजे ठीक तरह से चारा काटने या रूई धुनने की मशीन लगाना। ३१. किसी प्रकार से बैठाकर उन्हें काम करने के योग्य बनाना। जैसे—आटा पीसने, काम में प्रवृत्त या रत करना। जैसे—सामान ढोने के लिए मजदूर लगाना। ३२. ऐसा कार्य करना जिसमें बहुत से लोग एकत्र या सम्मिलित हों। जैसे—तुम तो जहाँ जाते हो वहाँ भीड़ (या मेला) लगा देते हो। ३३. किसी के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना। जैसे—(क) किसी से दोस्ती लगाना। (ख) किसी के साथ कोई रिश्ता लगाना। मुहावरा—किसी को लगा कर कुछ कहना या गाली देना=बीच में किसी का संबंध स्थापित करके किसी प्रकार का आरोप करना। जैसे—किसी की माँ-बहन को लगाकर कुछ कहना बहुत बड़ी नीचता है। ३४. शरीर का कोई अंग ऐसी स्थिति में लाना कि वह अपना काम ठीक तरह से कर सके। जैसे—काम में हाथ लगाना।
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लगाम  : स्त्री० [फा०] १. जोते जानेवाले घोड़े के मुँह में लगाया जानेवाला एक प्रकार का अर्ध चंद्राकार ढाँचा जिससे रासें बँधी होती है। क्रि० प्र०—चढ़ाना।—लगाना। मुहावरा—जबान या मुँह में लगाम न होना=बिना सोचे-समझे बकने की आदत होना। २. बाग। रास। मुहावरा—(किसी के पीछे) लगाम लिये फिरना=धरने-पकड़ने के उद्देश्य से किसी का पीछा करना। ३. कोई ऐसी चीज या बात जो किसी को नियंत्रण में रखती हो। जैसे—उनकी जबान (या मुँह) में लगाम तो है ही नहीं, अर्थात् वे अपनी बोलचाल पर नियंत्रण नहीं रख सकते। क्रि० प्र०—चढ़ाना।—लगाना।
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लगामी  : स्त्री० [फा० लगाम+हिं० ई (प्रत्यय)] गाय-भैस, घोड़े, बकरी आदि पशुओं के मुँह पर बाँधी जानेवाली वह जाली जिसके फल-स्वरूप वे कुछ काटने या खाने से वंचित हो जाते हैं।
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लगाय  : स्त्री० [हिं० लगना+आय (प्रत्यय)] १. लगावट। २. प्रेम। संबंध। उदाहरण—तिन सौ क्यों कीजिए लगाय।—सूर। अव्य० तक। पर्यंन्त।
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लगायत  : अव्य०=लगाय।
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लगार  : स्त्री० [हिं० लगना+आर (प्रत्यय)] १. काम करने-कराने का बँधा हुआ ढंग या प्रकार। बंधी। बंधेज। २. क्रम सिलसिला। ३. लगाव। संबंध। ४. प्रीति। लगाव। ५. वह जिससे किसी प्रकार का घनिष्ट संबंध हो। ६. किसी दूसरे के लिए रहस्य मय बातों का पता लगानेवाला दूत। ७. वह स्थान जहाँ से जुआरियों को जुए के अड्डे पर पहुँचाया जाता हो। ठिकाना। वि० १. किसी के पीछे या साथ लगा रहनेवाला। २. किसी के साथ प्रेम आदि का संबंध रखनेवाला। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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लगा-लगी  : स्त्री० [हिं० लगना] १. लगने अर्थात् प्रेम-संबंध चलता होने की अवस्था या भाव। २. मेल-जोल। हेल-मेल। ३. लांग-डाँट।
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लगाव  : पुं० [हिं, ०लगना+आव (प्रत्यय)] १. किसी के साथ लगे होने की अवस्था, गुण या भाव। २. सम्बन्ध। वास्ता। ३. प्रेम सम्बन्ध।
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लगावट  : स्त्री० [हिं० लगना+आवट (प्रत्यय)] १. लगने या लगे हुए होने का भाव या स्थिति। २. लगाव। संबंध। ३. श्रृंगारिक क्षेत्र का अनुराग, प्रेम या संबंध।
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लगावन  : स्त्री० =लगाव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगावना  : स०=लगाना।
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लगा-सगा  : पुं० [हिं० लगना+सगा अनु०] १. संपर्क। संबंध। २. अनुचित या गुप्त संबंध।
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लगि  : अव्य० [हिं० लग] १. तक। पर्यन्त। २. निकट। पास। उदाहरण—साँठ नाहिं लगि बात को पूछा।—जायसी। ३. के लिए। वास्ते। उदाहरण—कौड़ी लगि नग की रज छानत।—सूर। स्त्री० =लग्गी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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लगित  : भू० कृ० [सं०√लग् (संग)+क्त] १. लगा या लगाया हुआ। २. संयुक्त। संबद्ध। ३. प्राप्त। ४. प्रविष्ठ।
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लगी  : स्त्री० [हिं० लगना] १. वह अवस्था जिसमें पर-स्त्री पुरुष मे सम्बन्ध स्थापित हो। २. लाग-डाँट। (दे०) स्त्री० =लग्गी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगी-बदी  : स्त्री० [हिं० लगना+बदना] १. वह प्रेमपूर्ण या मित्रतापूर्ण अवस्था जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के कहे अनुसार दूसरो से बातचीत या व्यवहार करते हैं। २. लाग-डाँट। (दे०)
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लगु  : अव्य०=लगि। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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लगुआ  : वि० =लग्गू।
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लगुड़  : पुं० [सं०√लग्+उलच्, ल—ड] १. डंडा। २. लाठी। ३. लोहे का एक प्रकार का डंडा जिसे प्राचीन काल में पैदल सिपाही हाथ में रखते थे। ४. लाल कनेर।
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लगुड़ी (लिन)  : वि० [सं० लगुड़+इनि] दंडधारी। स्त्री० ‘लगुड़’ का स्त्री० अल्पा०। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगुल  : पुं० [सं० लांगूल] १. लाठी। लगुड़। २. शिश्न (डिं०)
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लगुवा  : वि० =लग्गू। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगूर (गूल)  : स्त्री० =लाँगूल (पूँछ)। पुं० =लंगूर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लगे  : अव्य० [हिं० लगना] १. निकट। पास। २. तक। पर्यन्त। (पूरब)।
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लगे-लगे  : पुं० [हिं० लगाना] बंदर। विशेष—प्रायः बन्दरों के आने पर लोग ‘लगे लगे’ कर कर उन्हें भगाने के लिए चिल्लाते है। इसी से इसका यह अर्थ हुआ। है।
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लगै  : अव्य० [हिं० लगना] १. के लिए। वास्ते। उदाहरण—लगै मेल्यिहौ रुपमणी।—प्रिथीराज। २. तक। पर्यंन्त।
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लगो  : वि० [अ] १. जो किसी काम का न हो। २. असंगत और बेतुका। स्त्री० बिलकुल झूठी और व्यर्थ की बात।
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लगोहाँ  : वि० [हिं० लगना+औहाँ (प्रत्यय)] १. जिसमें लगन या लगने की कामना या प्रवृत्ति हो। लगने का आकांक्षी। २. रिझवार।
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लग्गत  : स्त्री० [हिं० लगना] १. व्यापार में लगाया हुआ धन। पूँजी। (इन्वेस्टमेन्ट) २. दे० ‘लागत’।
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लग्गा  : पुं० [सं० लगुड़] [स्त्री० अल्पा० लग्गी] १. कई प्रकार के कार्यों में काम करनेवाला लंबा बाँस। जैसे—नाव चलाने का लग्गा। २. पेड़ से फल तोड़ने का लग्गा। मुहावरा—लग्गे से पानी पिलाना=बिलकुल अलग या बहुत दूर रहकर नाम मात्र के लिए थोड़ी सी या नहीं के बराबर सहायता करना। ३. फरसे के आकार का काठ का एक उपकरण जिससे कीचड़, घास आदि समेटते या हटाते हैं। पुं० [हिं० लगना] १. कार्य आरम्भ करने के लिए उसमें हाथ लगाने की क्रिया या भाव। जैसे—मकान बनाने में लग्गा लग गया है। ३. किसी दाँव पर जुआरी से भिन्न किसी और व्यक्ति द्वारा लगाया जानेवाला धन। ३. बराबरी की टक्कर या मुकाबला। (लखनऊ)। मुहावरा—लग्गा खाना=किसी की टक्कर या बराबरी का होना। जैसे—इन बातों में वह तुमसे लग्गा नहीं खा सकता। क्रि० प्र०—लगना।—लगाना।
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लग्गू  : वि० [हिं० लगना] १. लगनेवाला। २. किसी के साथ रहने या आने-जानेवाला। जैसे—पिछलग्गू। पुं० स्त्री० का उपपति या यार। (बाजारू) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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लग्गू-बज्झू  : पुं० [हिं० लगना+बझना] वे लोग जो किसी बड़े आदमी के साथ लगे रहते हों और उसकी हाँ में हाँ मिलाते रहते हों।
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लग्घड़  : पुं० [देश] १. एक प्रकार का छोटा चीता जो पशुओं का शिकार करने के लिए पाला और सधाया जाता है। २. बाज की जाति का भूरे रंग का एक प्रकार का शिकारी पक्षी जो प्रायः तीतर, बटेर आदि पकड़कर खाता है।
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लग्घा  : पुं० [स्त्री० अल्पा० लग्घी] =लग्गा।
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लग्घी  : स्त्री० १. =लग्गी। २. वह बांस जिससे नदी के तल पर टेक लगाकर नाव किसी ओर बढ़ाई जाती है।
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लग्न  : वि० [सं०√लग् (लगना)+क्त, नि० त-न] १. किसी के साथ या लगा या सटा हुआ। २. लज्जित। शर्मिंदा। २. आसक्त। पुं० १. फलित ज्योति में किसी राशि के पूर्वी या उदय क्षितिज पर लगे हुए या वर्तमान होने की स्थिति जो सभी कामों और बातों में शुभाशुभ फल देनेवाली मानी जाती है। विशेष—सूर्य प्रत्येक राशि में एक-एक महीने रहता है। अतः जिस राशि का सूर्य जिन दिनों होता है वही राशि उन दिनों उसके उदय क्षितिज अर्थात् पूर्वी क्षितिज पर रहती हैं, परन्तु पृथ्वी अपने अक्ष पर बराबर घूमती रहती है इसलिए दिन रात में बारहों राशियाँ दो-दो घंटों के लिए पूर्वी क्षितिज पर आती रहती है। यही दो घंटे का समय हर राशि का लग्नकाल माना जाता है। उदाहरणार्थ-यदि सूर्योदय के समय मेष लग्न हो तो उसके दो-दो घन्टे बाद वृष, मिथुन, कर्क आदि राशियों का लग्न-काल होता जाता है। परन्तु सूर्य और पृथ्वी दोनों अपनी कक्षा पर आगे भी बढ़ते रहते हैं और दिनमान भी घटता-बढ़ता रहता है। इसके फलस्वरूप प्रत्येक राशि का लग्न-काल भी प्रतिदिन प्रायः ४ मिनट आगे बढ़ता रहता है। जितने समय तक कोई राशि पूर्वी तथा उदय क्षितिज पर स्थित रहती है उतना समय उसी राशि के नाम से अभिहित होता है। जैसे—यदि कहा जाय कि कन्या लग्न में विवाह होगा तो उसका आशय यह होगा कि जिस समय कन्या राशि पूर्वी या उदय क्षितिज पर स्थित होगी, उस समय विवाह होगा। २. कोई शुभ काम करने के लिए फलित ज्योतिष के अनुसार निश्चित किया हुआ मुहुर्त। जैसे—यज्ञोपवीत या विवाह का लग्न। ३. विवाह। ब्याह। ४. वे दिन जिसमें फलित ज्योतिष के अनुसार विवाह आदि कृत्य विहित होते हैं। ५. बंदीजन सूत। ६. दे० ‘लगन’।
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लग्न-कंकण  : पुं० [सं० मध्य० स०] वह कंकण या मंगल-सूत्र जो विवाह के पूर्व वर और कन्या के हाथ में बाँधा जाता है।
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लग्नक  : पुं० [सं० लग्न+कन्] १. वह जो किसी की जमानत करे। प्रतिभू। जामिन। २. संगीत में एक प्रकार का राग जो हनुमान के मत से मेघ राग का पुत्र है।
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लग्न-कुंडली  : स्त्री० [सं० ष० त०] फलित ज्योतिष में वह चक्र या कुंडली जिससे यह जाना जाता है कि किसी के जन्म के समय कौन-कौन से ग्रह किस किस राशि में स्थित थे। जन्म-कुंडली।
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लग्न-दण्ड  : पुं० [सं०] गाने या बजाने के समय स्वर के मुख्य अंश या श्रुतियों को आपस में एक दूसरे से अलग न होने देना और सुन्दरता से उनका संयोग करना। लाग-डाँट। (संगीत)
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लग्न-दिन  : पुं० [सं० ष० त०] वह दिन जिसमें विवाह का मुहुर्त निकला हो।
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लग्न-पत्र  : पुं० [सं० ष० त०] वह पत्र जिसमें विवाह संबंधी कृत्यों तथा उनके समय का विवरण रहता है।
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लग्न-पत्रिका  : स्त्री० [सं० ष० त०]=लग्नपत्र।
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लग्न-पत्री  : स्त्री० =लग्न पत्र।
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लग्नायु (स्)  : स्त्री० [सं० लग्न-आयुस्, मध्य० स०] फलित ज्योतिष में लग्न-कुंडली के अनुसार स्थिर होनेवाली आयु।
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लग्नेश  : पुं० [सं० लग्न-ईश, ष० त०] किसी लग्न का स्वामी ग्रह। (ज्यो०)
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लग्नोदय  : पुं० [सं० लग्न-उदय, ष० त०] १. किसी लग्न का उदय अर्थात् आरम्भ होना। २. किसी लग्न के उदय होने का समय।
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