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शब्द का अर्थ

सन्यसन  : पुं० [सं० सम्-नि√एस् (होना)+ल्युट्-अन] [वि० संन्यस्त] १.फेंकना। छोड़ना। २. अलग या दूर करना। हटाना। ३. सांसारिक विषयों से संबंध छोड़कर अलग होना। ४. धरना। रखना। ५. जमाना। बैठाना। ६. खड़ा करना।
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सन्  : पुं० [सं० संवत् में, के सं से फा०] १. वर्ष साल। संवत्सर। २. गणना में कोई विशिष्ट वर्ष। ३. किसी विशिष्ट गणना क्रमवाली काल-गणना। विशेष—इसका प्रयोग प्रायः पाश्चात्य गणना प्रणालियों के संबंध में ही होता है। जैसा—ईसवी सन् हिजरी सन् आदि। भारतीय गणना प्रणालियों के संबंध में सवत् का प्रयोग होता है।
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सन्न  : वि० [सं० शून्य, हिं० सुन्न] १. संज्ञाशून्य। संवेदनारहित। बिना चेतना का सा। जड़। २. भौचक्का। स्तंभित। स्तंब्ध। जैसे—यह सुनते हा वह सन्न रह गया। ३. बिलकुल चुप। मौन। मुहा-सन्न मारना=बिलकुल चुप हो जाना। आवश्यकता होने पर भी कुछ न बोलना। सन्नाटा खीँचना। पुं० [सं०] चिरौंजी का पेड़।
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सन्नक  : वि० [सं०] बौना।
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सन्नत  : भू० कृ० [सं० सम्√नम् (झुकना)+क्त=न] १. अच्छी तरह झुका हुआ। २. नीचे आया हुआ। ३. भरा हुआ।
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सन्नति  : स्त्री० [सं० सम्√नम् (झुकना)+क्तिन] १. झुकाव। नति। २. नम्रता। विनय। ३. किसी ओर होने वाली प्रवृत्ति। ४. कृपा-दृष्टि। मेहरबानी की नजर। ५. आवाज। शब्द। ६. दक्ष की एक कन्या जो ऋतु को ब्याही थी।
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सन्नद्ध  : वि० [सं० सम्√नह् (बाँधना)+क्त] १. किसी के साथ कसा या बँधा हुआ। २. जो कवच आदि पहनकर युद्ध के लिए तैयार हो गया हो। ३. कोई कार्य करने के लिए उद्यत। तैयार। ४. किसी के साथ जुड़ा या लगा हुआ। ५. पास समीप का।
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सन्नयन  : पुं० [सं०] १. ले जाना। २. संपत्ति विशेषतः अचल संपत्ति का लेख्य आदि के द्वारा एक हाथ से दूसरे के हाथ में जाना या दिया जाना। अभिहस्तांतरण। (कन्वेएंस)
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सन्नयन लेखक  : पुं०=सन्नयनकार।
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सन्नयम लेखन  : पुं० [सं०] सन्नयन विषयक लेख्य आदि लिखने का काम। (कन्वेयंसिंग)
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सन्नयन विद्या  : स्त्री [सं०] वह विद्या या शास्त्र जिसमें सन्नयन संबंधी लेख्य आदि प्रस्तुत करने का विवेचन होता है। (कन्वेयंसिंग)
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सन्नाटा  : पुं० [सं० संनष्ट] १. ऐसी वातावरणीय स्थिति जिसमें किसी भी प्रकार का शब्द न हो रहा हो। २. उक्त स्थिति में पड़कर भयभीत ता भौंचक होने का भाव। मुहा—सन्नाटे में आना=भयभीत तथा स्तब्ध हो जाना। ३. मौन। चुप्पी। क्रि०प्र०—खींचना।—मारना। ४. निर्जनता। ५. चहल-पहल का अभाव। मुहा—सन्नाटा बीतना=उदासी में समय काटना। ६. लेन-देन, व्यापार आदि में सहसा आने वाली मंदी। जैसे आजकल बाजार में सन्नाटा है। विशेषः इस अर्थ में इसका प्रयोग विशेषण की तरह भी होता है। वि० १. जहाँ किसी प्रकार का शब्द सुनाई न पड़ता हो। नीरव। स्तब्ध। २. निराला। निर्जन। ३. (स्थान) जिसमें किसी प्रकार की क्रिया न हो रही हो। पुं० [अनु० सन सन] १. हवा के जो से चलने की आवाज। वायु के बहने का शब्द। पद-सन्नाटे का=सन-सन शब्द करता हुआ और तेजी से चलता हुआ। जैसा—सन्नाटे की हवा।
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सन्नादी  : पुं० [सं० सम्√नादिन] व्याकरण में ऐसा अक्षर या वर्ण जिसका उच्चारण किसी स्वर की सहायता से हा होता हो, बिना स्वर लगाए जिसका उच्चारण हो ही न सकता हो। (कान्सोनेन्ट) जैसे—क, ख, ग, आदि। विशेष—बिना स्वर की सहायता के जहाँ किसी वर्ण का उच्चारण होता है, वहाँ वह हल कहलाता है। वि० १. नाद या स्वर से युक्त। २. नाद करने वाला।
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सन्नाह  : पुं० [सं० सम्√नह (बाँधना)√ +घ़ञ] १. कवच। बकतर। २. उद्योग। प्रयत्न।
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सन्निकट  : अव्य० [सं० सम्-निकट] १. बहुत निकट। बिलकुल पास।
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सन्निकर्ष  : पुं० [सं० सम्+नि√कृष (समीप करना)+ञ] [भू० कृ० सन्निकृष्ट] १. संबंध लगाव। २. निकटता। समीपता ३. नाता। रिश्ता। ४. आधार। आश्रय। ५. न्याय में इंद्रियों से होने वाला विषयों का संबंध।
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सन्निकाश  : वि० [सं० सम् निकाश] सदृश। समान।
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सन्निकृष्ट  : भू० कृ० [सं० सम्-नि√कृष् (समीप करना)+क्त] १. पास लाया हुआ। २. निकटता। करीब। पास।
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सन्निध  : पुं० [सं० सम्-नि√धा (रखना)+क] १. समीप्य। २. आमने सामने होने की स्थिति।
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सन्निधाता (तृ)  : पुं० [सं० सम्-नि√धा (रखना)+तृच] १. प्राचीन भारत में वह राजकर्मचारी जो लोगो को अपने साथ ले जाकर न्यायालय में उपस्थित करता था। २. राजकोष का प्रधान अधिकारी।
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सन्निधान  : पुं० [सं० सन्-नि√धा (रखना)+ल्युट्-अन] १. दो या अधिक चीजों को साथ-साथ या अलग-अलग रखना। २. वह अवस्था जिसमें चीजें जिसमें चीजें साथ-साथ या अगल-बगल रहती या होती हैं। निकटता। समीपता। ३. पड़ोस। ४. इंद्रियो का विषय। ५. स्थापित करना। स्थापना। अव्य० निकट। पास।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सन्निधि  : स्त्री० [सं० सम्-नि√धा (रखना)+कि] सन्निधान। (दे०)
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सन्निपात  : पुं० [सं० ब० स०] १. नीचे आना, उतरना या गिरना विशेषतः साथ साथ नीचे आना, उतरना या गिरना। २. जुड़ना। मिलना। ३.टकराना। भिड़ना। ४. इकट्ठा या एक होना। ५. कई घटनाओ का एक साथ घटित होना। ६. बहुत सी चीजों या बातों का मिश्रण। समाहार। ७.वैद्यक मे, ज्वर की एक अवस्था जिसमें कफ, पित्त और वात का एक साथ कुपित होकर बहुत उग्र रूप धारम कर हैं। त्रिदोष। सरसाम।
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सन्निबंध  : पुं० [सं०सम्-नि√बंध (बाँधना)+घञ] [भू० कृ० सन्निबद्ध] १. एक में बाँधना। जकड़ना। २. लगाव। संबध। ३. आसक्ति। ४. असर। प्रभाव। ५. परिणाम। फल। नतीजा।
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सन्निबद्ध  : भू० कृ० [सं० सम्-नि√बंध (बाँधान)+क्त, नलोप] १. एक में बँधा या जकड़ा हुआ। २. अटका या फँसा हुआ। ३. सहारे पर टिका हुआ।
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सन्निभ  : वि० [सं० सम्-नि√भा (प्रकाशित करना)+क] मिलता जुलता। सदृश। समान।
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सन्निभूत  : वि० [सं० सम्-नि√भृ (भरण पोषण करना)+क] १. छिपा हुआ। २. समझ-भूझकर बातें करनेवाला।
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सन्निमग्न  : वि० [सं०] १. खूब ढूबा हुआ। २. सोया हुआ।
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सन्नियोग  : पुं० [सं० सम्-नि√युज (मिलना)+घञ] १. संबध। २. संयोग। ३. आसक्ति। ४. नियुक्ति। ५. आदेश।
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सन्निरुद्ध  : भू० कृ० [सं०] १. ठहराया या रोका हुआ। २. दमन किया या दबाया हुआ। ३. अच्छी तरह या कसकर भरा हुआ।
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सन्निरोध  : पुं० [सं० सम्-नि√रुध (रोकना)+घ़ञ] १. रोक। रुकावट। २. बाधा। ३. निवारण। ४. दमन। ५. तंगी। संकोच। ६. तंग रास्ता।
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सन्निवास  : पुं० [सं० सम्-नि√वस् (रहना)+घञ] १. साथ रहना। २. बसना। ३. घोंसला।
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सन्निविष्ट  : भू० कृ० [सं० सम्-नि√विश् (प्रवेश करना)+क्त] १. अंदर या भीतर आया या लगाया हुआ। २. जुटा या जुटाया हुआ। ३. किसी के बीच में जोड़ना, या बढ़ाया या लगाया। (इन्सटेंड) ४. किसी के साथ जमा, बैठा या रखा हुआ। ५. स्थापित किया हुआ।
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सन्निवेशन  : पुं० [सं०] १. अंदर जाना या साथ में ले जाना। प्रवेश करना या कराना। २. एकत्र होना या करना। जुटाना। या जुटना। ३. किसी के बीच में जोड़ना, बढ़ाना या लगाना। ४. किसी पास या साथ बैठना। ५. सजा या जमाकर रखना। ६. आधार। आश्रय। ७. वास-स्थान। ७. घर। मकान। ९.समूह। १॰.प्रबंध। व्यवस्था। ११. रचना। गठन।
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सन्निवेशित  : भू० कृ० [सं०] १. जिसका सन्निवेशन हुआ या किया गया हो। २. बीच में जोड़ा, बढ़ाया या लगाया हुआ।
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सन्निहित  : भू० कृ० [सं० सम्-निधा (रखना)+क्त, धा=हि] १. किसी के साथ या पास रखा हुआ। २. समीपस्थ। ३. पड़ोस का। ४. टिकाया, ठहराया या रखा हुआ। ५. कोई काम करने के लिए उद्यत। तैयार।
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सन्नी  : वि० [हिं०] १. सन या पटसन से संबंध रखने वाला। २. सन या पटसन से बना हुआ। स्त्री० १. सन सो बना हुआ कपड़ा। २. सन की जाति का एक प्रकार का छोटा पौधा जो बगीचों में शोभा के लिए लगाया जाता है। पुं०=शनिवार।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सन्मन  : पुं० [सं० सद्+मन] शुद्ध या अच्छा मन। उदा०—किसी अपर सत्ता के सम्मुख सन्मन से नत होना। दिनकर। वि० अच्छे या सद् मनवाला।
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सन्मान  : पुं० [सं० ष० त०] सम्मान।
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सन्मानना  : स०=सनमानना।
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सन्मार्ग  : पुं० [सं०] उत्तम या भला मार्ग।
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सन्मुख  : पुं० [सं०] अच्छा या सुंदर मुख। वि० अव्य० सं० ‘सन्मुख’ का अशुद्ध रूप।
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सन्यास  : पुं०=संन्यास।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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