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सिर  : पुं० [सं० शिरस्] १. मनुष्यों, जीव-जन्तुओं आदि के शरीर में गरदन से आगे या ऊपर का वह गोलाकार भाग जिसमें आँख, कान नाक, मुँह आदि अंग होते हैं, और जिसके अंदर मस्तिष्क रहता है। कपाल। खोपड़ी। (हेड) विशेष—कुछ अवस्थाओं में यह प्राणियों की जान या प्राण का सूचक होता है। और कुछ अवस्थाओं में व्यक्तियों की प्रतिष्ठा या सम्मान का सूचक होता है। मुहा—(किसी को) सिर आँखों पर बैठाना=बहुत आदर सत्कार करना। बहुत आवभगत करना। (किसी की आज्ञा, कथन आदि) सिर-आँखों पर होना=सहर्ष मान्य या स्वीकृत होना। शिरोधार्य होना। जैसे—आपकी आज्ञा सिर आँखों पर है। सिर उठाकर चलना=अभिमानपूर्वक, अथवा अपनी प्रतिष्ठा या मर्यादा के भाव से युक्त होकर चलना। सिर उठाना= (क) किसी के विरोध में खड़े होना। जैसे—प्रजा का राजा के विरुद्ध सिर उठाना। (ख) सिर और मुँह ऊपर करके किसी की ओर प्रतिष्ठा, प्रयत्न या साहसपूर्वक देखना। जैसे—अब वह तुम्हारे सामने सिर नही उठा सकता। सिर उठाने की फुर्सत न होना=कार्य में बहुत अधिक व्यस्त होने के कारण इधर-उधर की बातों के लिये नाम को भी अवकाश न होना। (किसी का) सिर उतारना=सिर काट कर हत्या करना। सिर ऊँचा करना=दे० ऊपर ‘सिर उठाना’। सिर ऊँचा होना=आदर, प्रतिष्ठा या सम्मान में वृद्धि होना। (स्त्रियों का) सिर करना=बाल सँवारना। चोटी गूँथना। सिर काढ़ना=दे० ‘नीचे सिर निकालना’। सिर का बोझ उतारना=दे० नीचे ‘सिर से बोझ उतारना’। (किसी के पास) सिर के बल जाना=बहुत ही आदर, प्रेम या श्रद्धा से युक्त होकर और सब प्रकार के कष्ट सहकर जाना। सिर खपाना=ऐसा काम या बात करना जिससे कोई लाभ न हो और व्यर्थ मस्तिष्क थक जाय। माथापच्ची करना। (किसी का) सिर खाना=व्यर्थ की बातें करके किसी को तंग या परेशान करना। सिर खाली करना=दे० ऊपर ‘सिर खपाना’। (किसी का) सिर खुजलाना=ऐसा उपद्रव या शरारत करना कि उसके लिये यथेष्ट दंड मिल सके। शामत आना। जैसा—तुम्हारी इन चालों से तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारा सिर खुजला रहा है, अर्थात तुम मार खाना चाहते हो। सिर गूँथना= (क) सिर के बाल बाँधने के लिये कंघी-चोटी करना। (ख) कलियों, फूलों आदि के सिर अलंकृत करना। सिर घुटवाना=दें० नीचे ‘सिर मुँडवाना’। सिर घूमना=सिर में चक्कर आना। (ख) कोई विकट स्थिति सामने आने पर बुद्धि चकराना। जैसा—उन लोगों की मार पीट देखकर तो मेरा सिर घूमने लगा। सिर चकराना=सिर घूमना। (किसी के) सिर चढ़कर मरना= (किसी को) सिर चढ़ाना। किसी के ऊपर जान देना। (किसी के आगे अपना) सिर चढ़ाना=किसी देवी या देवता के सामने अपना सिर काटकर गिराना। आप ही अपना बलिदान करना। (किसी को) सिर चढ़ाना= किसी की छोटी-मोटी बातों की उपेक्षा करते हुए उसे बहुत उद्दंड या गुस्ताख बना देना। (कोई चीज अपने) सिर चढ़ाना=आदरपूर्वक या पूज्य भाव से ग्रहण करना। शिरोधार्य करना। सिर जाना=मृत्यु हो जाना। उदा०—सर (सिर) जाता है, सर (सिर) से तेरी उल्फत नहीं जाती।—कोई शायर। (किसी के साथ) सिर जोड़कर बैठना=बहुत ही पास सटकर या हिल-मिलकर बैठना। सिर जोड़ना=किसी काम या बात के लिये कुछ लोगों को इकठठा करना। सिर झाड़ना=सिर के बालों में कंघी करना। (किसी का) सिर झुकाना=किसी को इस प्रकार परास्त करना कि वह नत मस्तक होने के लिए विवश हो जाय। (किसी के आगे) सिर झुकाना= (क) नम्रतापूर्वक सिर नीचे करना। नतमस्तक होना। (ख) लज्जा आदि के कारण सिर नीचे करना। (किसी के) सिर डालना=किसी प्रकार का उत्तरदायित्व या भार किसी को देना या किसी पर रखना। सिर ढारना=प्रसन्न होकर सिर हिलाना या झूमना। उदा०—मुरली की धुनि सुनि समर वधू सिर ढोरैं।—सूरदास मदन मोहन। (किसी का) सिर तोड़ना=अभिमान, उद्दंडता, शक्ति आदि नष्ट करना। जैसा—यदि वे मुझसे मुकदमेबाजी करेंगे तो मैं उनका सिर तोड़ दूँगा। (किसी काम, बात या व्यक्ति के लिए) सिर देना=प्राण निछावर करना। जान देना। (किसी के) सिर धरना=किसी के सिर मढ़ना या रखना। (कोई चीज या बात) सिर धरना=आदरपूर्वक या पूज्यभाव से ग्रहण करना। शिरोधार्य करना। सिर धुनना=पश्चात्ताप या शोक के कारण बहुत अधिक दुःख प्रकट करना। (अपना) सिर नंगा करना=सिर के बाल खोल कर इधर-उधर बिखेरना (किसी का) सिर नंगा करना=अपमानित या बेइज्जत करना। सिर नवाना= दे० ऊपर ‘सिर झुकाना’। सिर निकालना=दबी हुई, शांत या साधारण स्थिति से बाहर निकालने का प्रयत्न करना। सिर नीचा होना= (क) अप्रतिष्ठा होना। इज्जत बिगड़ना। मान भंग होना। (ख) पराजय या हार होना। (ग) खेद, लज्जा आदि का अनुभव होना। सिर पचाना=दे० ऊपर ‘सिर खपाना’। सिर पटकना=बहुत कुछ विवश होते हुए भी किसी काम के लिए निरंतर परिश्रम और प्रयत्न करते रहना। सिर पड़ना=दे० नीचे ‘सिर पर पड़ना’। (भूत, प्रेत, देवी, देवता आदि का) सिर पर आना= किसी व्यक्ति का भूत-प्रेत आदि के आवेश या वश में होना। भूत-प्रेत, देवी-देवता आदि के आवेश से प्रभावित होना। (कोई अवसर) सिर पर आना=बहुत ही पास आ जाना। जैसे—बरसात (या होली) सिर पर आ गई है। (कोई कष्टदायक अवसर या बात) सिर पर आना या आ पड़ना=बहुत ही पास या बिल्कुल सामने आ जाना। जैसे—कोई आफत या संकट सिर पर आना या आ पड़ना। (कुछ) सिर पर उठा लेना=इतना अधिक उपद्रव करना या हल्ला मचाना कि आस पास के लोग ऊब या घबरा जाएँ। जैसे—तुमने जरा-सी बात पर सारा घर सिर पर उठा लिया। सिर पर काल चढ़ना=मृत्यु या विनाश का समय बहुत पास आना। (किसी के सिर पर) खून चढ़ना या सवार होना= (क) इतना अधिक आवेश या क्रोध चढ़ना कि मानो किसी के प्राण ले लेगें। (ख) हत्याकारी का अपने अपराध की भीषणता के विचार से आपे में न रह जाना या सुध-बुध खो बैठना। (अपने) सिर पर खेलना=ऐसा काम करना जिसमें जान तक जा सकती हो। जान जोखिम में डालना। (किसी बात का) सिर पर चढ़कर बोलना=प्रत्यक्ष रूप से सामने आकर अपना अस्तित्व प्रकट करना। जैसे—जादू वह जो सिर पर चढ़कर बोले। (किसी के) सिर पर पड़ना= (क) उत्तरदायित्व या भार आकर पड़ना। जैसे—जिसके सिर पर पड़ेगी वह आप ही सँभालेगा। (ख) कष्ट, संकट आदि घटित होना। गुजरना। जैसे—सारी आफत तो उसी के सिर पड़ी है। (अपने) सिर पर पाँव रखकर भागना=बहुत जल्दी या तेजी से भाग जाना। जैसे—सिपाही की आवाज सुनते ही चोर सिर पर पाँव रखकर भागा। (किसी के) सिर पर बीतना=कष्ट, संकट आदि घटित होना। जैसे—जिसके सिर पर बीतती है, वही जानता है। (कोई चीज या बात) सिर पर रखना=आदरपूर्वक ग्रहण करना। शिरोधार्य करना। सिर पर लेना=अपने ऊपर उत्तरदायित्व या जिम्मेदारी लेना। जैसे—झगड़े या बदनामी की बात अपने सिर पर लेना। सिर पर शैतान चढ़ना=क्रोध, भय आदि के कारण विवेक नष्ट होना। जैसा—सिर पे शैतान के एक और भी शैतान चढ़ा।—कोई शायर। सिर पर सींग जमना=ऐसी स्थिति में आना कि औरों से व्यर्थ लड़ाई-झगड़ा करने को जी चाहे। सिर पर सींग होना=कोई विशेषता होना। (परिहास और व्यंग्य) जैसे—क्या तुम्हारे सिर सींग है जो तुम्हारी हर बात मान ली जाय। सिर पर सेहरा होना=किसी प्रकार की विशेषता होना। (व्यंग्य) जैसा—क्या तुम्हारे सिर पर सेहरा है जो सब चीजें तुम्ही को दे दी जाँय। (किसी काम या बात का किसी के) सिर पर सेहरा होना=किसी कार्य का श्रेय प्राप्त होना। वाहवाही मिलना। जैसे—इस काम का सेहरा तुम्हारे सिर पर ही रहा। (किसी के) सिर पर हाथ फेरना=किसी अनाथ या पीड़ित को अपनी रक्षा में लेकर उसका समर्थक या सहायक बनना। (किसी का किसी के) सिर पर होना=पोषक, समर्थक या संरक्षक का वर्तमान होना।—जैसा—उसके सिर पर कोई होता तो यह नौबत न आती। (कोई बात) सिर पर होना= (क) सामने या समक्ष होना। बहुत पास होना। (ख) थोड़े ही समय में घटित होने की आशा या संभावना होना। जैसा—होली सिर पर है, कपड़े जल्दी बनवा लो। सिर फिरना या फिर जाना=बुद्धि या मस्तिष्क का ठिकाने न रहना। पागलपन के लक्षण प्रकट होना। जैसे—तुम्हारी इन बातों से तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारा सिर फिर गया। (किसी से) सिर फोड़ना=व्यर्थ का प्रयत्न या बकवाद करना। जैसे—तुम तो किसी की बात मानोगे नहीं तुमसे कौन सिर फोड़े। सिर बाँधना=सिर के बाल बाँधना या कंघी चोटी करना। (किसी का) सिर बाँधना=सिर पर आक्रमण या वार करना। (पटेबाज) (घोड़े का) सिर बाँधना=लगाम इस प्रकार खीँचें या पकड़े रहना कि चलने के समय घोड़े का सिर सीधा या सामने रहे। (सवार) सिर बेचना=सेना की नौकरी में नाम लिखवाना। सिर भारी होना=सिर में पीड़ा होना या थकावट जान पड़ना। (रोगी होने के पूर्व लक्षण) सिर भन्नाना=दे० ऊपर ‘सिर घूमना’। (कोई काम या बात किसी के) सिर मढ़ना= (क) कोई काम या बात जबरदस्ती किसी के जिम्मे लगाना। (ख) किसी को किसी अपराध या दोष के लिए उत्तरदायी ठहराना या बनाना। (कोई काम या बात) सिर मानकर करना=आज्ञा के रूप में मानकर कोई काम करना। उदा०—सहज सुहृद् गुरु, स्वामी सिख, जो न करई सिर मानि।—तुलसी। (किसी से) सिर मारना=दे० ऊपर ‘सिर खपाना’। (कोई चीज किसी के) सिर मारना=बहुत ही उपेक्षापूर्वक कोई चीज किसी को देना या लौटाना। जैसे—तुम यह किताब लेकर क्या करोगे ? जिसकी है उनके सिर मारो। सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना=प्रारंभ में ही कार्य बिगड़ना। कार्यारंभ होते ही विघ्न पड़ना। सिर मुँड़ाना= (क) सिर के बाल मुँड़वाकर त्यागी या साधु बनना। (ख) अपने पास का धन गवाँ डालना। (किसी का) सिर रंगना=लाठी आदि से प्रहार करके सिर लहू-लुहान करना। (किसी के) सिर रखना=दे० ऊपर (किसी के) सिर मढ़ना। सिर रहना= (क) मान रहना। प्रतिष्ठा बनी रहना। (ख) जीवन या प्राण रहना। जैसा—सिर रहते मैं कभी यह काम न होने दूँगा। (किसी काम या बात के) सिर रहना=इस बात का बराबर ध्यान रखना कि कोई काम किस प्रकार हो रहा है। (किसी का किसी व्यक्ति के) सिर रहना=किसी के अतिथि, आश्रित या भार बनकर रहना। जैसे—वहाँ जायँगे तो किसी दोस्त (या ससुराल) के सिर रहेगें। (अपराध या दोष किसी के) सिर लगाना=अपराधी या दोषी ठहराना या बताना। उदा—तुम तो दोष लगावनि कौं सिर बैठे देखत तेरें।—सूर। सिर सफेद होना=सिर के बाल पकना। (वृद्धावस्था का लक्षण) (किसी का) सिर सहलाना=किसी को प्रसन्न करने के लिए उसका आदर सत्कार करना। सिर सूँघना=छोटो पर अपना प्रेम दिखाते हुए उनका सिर सूँघने की क्रिया करना। उदा०—दै असीस तुम सूँघि सीस सादर बैठायो।—रत्नाकर।सिर से कफन बाँधना=जान बूझकर मरने को तैयार होना। सिर से खेल जाना=जान-बूझकर प्राण दे देना। सिर से खेलना= (क) सिर पर भूत-प्रेत आदि का आवेश होने की दशा में सिर इधर-उधर हिलाना। अभुआना। (ख) जान जोखिम में डालना। सिर से पानी गुजरना=ऐसी स्थिति में पड़ना कि कष्ट या संकट पराकाष्ठा तक पहुँच जाय और बचने की कोई आशा न रह जाय। (बाढ़ में डूबते हुए आदमी की तुलना के आधार पर) सिर से पैर तक= (क) ऊपर से नीचे तक। (ख) आदि से अंत तक। (ग) पूरी तरह से। सिर से पैर तक आग लगना=अत्यन्त क्रोध चढ़ना और दुःख होना। जैसा—उसकी बातें सुनकर मेरे तो सिर से पैर तक आग लग गई। सिर से बला टलना=व्यर्थ की झंझट या परेशानी दूर होना। सिर से बोझ उतरना= (क) उत्तदायित्व से मुक्त होने या काम पूरा हो चुकने पर निश्चित होना। (ख) झंझट या बखेड़ा दूर होना। सिर हिलाना= (क) स्वीकृति या अस्वीकृति जताने के लिए सिर को गति देना। (ख) प्रसन्नता सूचित करने के लिए सिर को गति देना। जैसे—अच्छा संगीत सुनकर सिर हिलाना। (किसी काम या बात के) सिर होना=कोई गुप्त काम या बात होने पर लक्षणों से उसे ताड़ या समझ लेना। जैसा—हमने तो सबकी आँख बचाकर उसे रुपया दिया था, पर तुम सिर हो गये (अर्थात तुमने ताड़ या समझ लिया) (किसी के) सिर होना=किसी के पीछे पड़ना। जैसे—अब तुम उन्हें छोड़कर हमारे सिर हुए हो। (दोष आदि किसी के) सिर होना=जिम्मे होना। ऊपर पड़ना। जैसे—यह सारा दोष तुम्हारे सिर है। २. ऊपर का सिरा। चोटी। वि० १. बड़ा। महान। २. उत्तम। श्रेष्ठ। ३. अच्छा। बढ़िया। अव्य० १. के ऊपर। पर। २. ठीक अवसर पर। जैसे—सब काम समय सिर होते हैं। उदा०—कही समय सिर भगत गति।—तुलसी। ३. आधार या आश्रय पर। जैसे—(क) वह बहाने सिर वहाँ से उठकर चला गया अर्थात बहाना बनाकर चला गया। (ख) मैं तो वहाँ काम सिर गया था; अर्थात काम होने के कारण चला गया था।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरई  : स्त्री० [हिं० सिर+ई (प्रत्य०)] खाट या पलंग के चौखट में उस ओर की लकड़ी जिस ओर सोने के समय सिरहाना रखते हैं।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-कटा  : वि० [हिं० सिर+कटा] [स्त्री० सिर+कटी] १. जिसका सिर कट गया हो। जैसे—सिर कटी लाश। २. दूसरों का सिर काटने अर्थात बहुत अधिक अपकार करनेवाला।
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सिरका  : पुं० [पा० सिर्क] अंगूर, ईख, जामुन आदि के रस का वह रूप जो उसे धूप में रखकर और सूर्य की गरमी से पकाकर तैयार किया जाता है।
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सिरका-कश  : पुं० [फा०] सिरका या अर्क खींचने का एक प्रकार का यंत्र।
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सिरकी  : स्त्री० [हिं० सरकंडा] १. सरकंडा। सरई। सरहरी। २. सरकंडे की तीलियों की बनी हुई टट्टी, जिसे बैल गाड़ियों पर धूप बरसात आदि से बचने के लिए लगाते हैँ। ३. बाँस की पतली नली जिसमें बेल-बूटे काढ़ने का कला बत्तू भरा रहता है। पुं० कुंजर (जाति)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-खप  : वि० [हिं० सिर+खपना] १. दूसरों का सिर खपाने वाला। बक-बककर तंग या परेशान करने वाला। २. बहुत अधिक परिश्रम करके अपना सिर खपाने वाला। ३. (काम) जिसमें बहुत अधिक सिर खपाना पड़ता है। जैसे—यह बहुत ही वाहियात और सिर-खप काम है।
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सिर-खपना  : वि०=सिर-खप।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-खपी  : स्त्री० [हिं० सिर+खपना] सिर खपाने की क्रिया या भाव।
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सिर-खिली  : स्त्री० [देश०] मटमैले रंग की एक प्रकार की चिड़िया। जिसकी चोंच और पैर काले होते हैं।
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सिरखिस्त  : पुं० [फा० शीरखिश्त] दवा के काम आने वाला एक प्रकार का गोंद। यवशर्करा।
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सिरगा  : पुं० [देश०] घोड़ों की एक जाति।
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सिरगिरी  : स्त्री० [हिं० सिर+गिरि=चोटी] १. टोपी, पगड़ी आदि में लगाने की कलगी। २. चिड़ियों के सिर पर की कलगी।
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सिरगोला  : पं० [?] दुग्ध पाषाण।
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सिर-घुरई  : स्त्री० [हिं० सिर+घूरना=घूमना] ज्वरांकुश तृण।
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सिर-चंद  : पुं० [हाथी के मस्तक पर शोभा के लिए लगाया जाने वाला एक प्रकार का अर्द्ध चन्द्राकार आभूषण।
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सिरजक  : वि० [सं० सृजक, हिं० सिरजना] सृजन या सर्जन करने वाला। रचने वाला। पुं० ईश्वर।
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सिरजन-हार  : सि० [सं० सर्जन+हिं० हार (=वाला)] सृजन करने अर्थात बनाने या रचने वाला। पुं० ईश्वर। परमात्मा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरजना  : स० [सं० सर्जन] सृजन करना। बनाना। रचना। स०=संचना (संचय करना)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरजित  : वि० [सं० सर्जित] सिरजा अर्थात बनाया या रचा हुआ।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-ढकाई  : स्त्री० [हिं० सिर+ढ़कना] १. सिर ढ़ँकने की क्रिया। २. कुमारी वैश्या के संबंध की वह रसम जिसमें वह पहले-पहल पुरुष से समागमन करती है और उसका सिर ढककर उसे वधू का रूप धारण कराया जाता है।
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सिर-ताज  : वि० [फा० सर+अ० ताज] अग्र-गण्य। प्रधान। मुख्य। पुं० १. सिर पर पहनने का ताज। मुकुट। २. अपने वर्ग में सर्व-श्रेष्ठ वस्तु या व्यक्ति। शिरोमणि।
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सिरतान  : पुं० [हिं० सिर+तान ?] १. कश्तकार। २. मालगुजार।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-ता-पा  : अव्य० [फा० सिर-ता-पा] १. सिर से पाँव तक। २. ऊपर से नीचे तक। ३. कुल का कुल। पूरा का पूरा।
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सिरती  : स्त्री० [हिं० सीर] वह रकम जो असामी जमीन जोतने के बदले में जमींदार को देता था। लगान।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरत्राण  : पुं०=शिरस्त्राण।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरदार  : पुं०=सरदार।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरदारी  : स्त्री०=सरदारी।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरदुआली  : स्त्री० [फा० सरदुआल] घोड़े के मुँह का वह साज जिसमें लगाम अटकी रहती है।
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सिर-धरा  : वि० [हिं० सिर+धरना] १. जिसे सिर पर रखा जा सके। शिरोधार्य। २. बहुत अधिक प्यार-दुलार में तपला हुआ। पुं० वह जो किसी को अपने सिर पर रखता अर्थात उसका संरक्षक होता है।
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सिरधरू  : वि०=सिर-धरा।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-नामा  : पुं० [फा० सरनाम, मि० सं० शीर्ष-नाम] १. पत्र के आरंभ में पत्र पाने वाले का नाम, उपाधि, अभिवादन आदि। २. पाने वाले का नाम और पता जो चिट्ठी के ऊपर लिखा जाता है। ३. लेखों आदि का शीर्षक।
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सिरनेत  : पुं० [हिं० सिर+सं० नेत्री=धज्जी या डोरी] १. पगड़ी। २. क्षत्रियों का एक वर्ग या शाखा।
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सिरपच्ची  : स्त्री० [हिं० सिर+पचाना] १. सिर खपाने की क्रिया या भाव। २. सिर खपाने के कारण होनेवाला कष्ट।
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सिर-पाव  : पुं०=सिरोपाव। (दे०)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-पेच  : पुं० [फा० सर-पेच] १. पगड़ी। २. पगड़ी के ऊपर बाँधा जाने वाला एक प्रकार का आभूषण या गहना।
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सिर-पोश  : पुं० [फा० सर-पोश] [भाव० सिरपोशी] १. सिर ढकने का टोप। सिर पर का आवरण। २. बन्दूक का गिलाफ। ३. किसी चीज को ऊपर ढकने का गिलाफ।
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सिर फिरा  : वि० [हिं० सिर+फिरना] [स्त्री० सिर-फिरी] १. जिसका सिर फिर गया अर्थात मस्तिष्क उलट या विकृत हो गया हो। २. जिसकी बुद्धि सामान्य स्तर से बहुत घट कर हो और इसीलिए जो ऊल-जलूल काम करता हो। ३. कुछ-कुछ पागलों का सा। जैसे—सिर-फिरी बातें।
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सिर-फूल  : पुं० [हिं० सिर+फूल] सिर पर पहना जाने वाला स्त्रियों का एक आभूषण।
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सिर-फेंटा  : पुं० [हिं० सिर+फेंटा] सापा। पगड़ी। मुरेठा।
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सिर-बंद  : स्त्री० [हिं० सिर+फा० बंद] साफा।
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सिर-बंदी  : स्त्री० [हिं० सिर+फा० बेंदी] माथे पर पहनने वाला स्त्रियों का एक आभूषण। पुं० एक प्रकार का रेशम का कीड़ा।
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सिर-बेंदी  : स्त्री०=सिर-बंदी।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर-बोझी  : पुं० [हिं० सिर-बोझ] एक प्रकार का पतला बाँस जो पाटन के काम आता है।
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सिरमट  : पं०=सीमेंट। उदा०—सार्थकता को पुष्ट करने वाला। सिरिमिट है उनका परस्पर समीपत्व।—अज्ञेय।
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सिरमनि  : वि० पुं०=शरोमणी।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरमिट  : पुं०=सीमेंट।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरमौर  : वि० [हिं० सिर+मौर] शरोमणि। सिर-ताज। पुं० सिर का मुकुट।
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सिररुह  : पुं०=शिरोरुह। (सिर के बाल)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरवा  : पुं० [हिं० सरा] वह कपड़ा जिससे खलिहान में अनाज बरसाने के समय हवा करते हैं। ओसाने में हवा करने का कपड़ा। क्रि० प्र०—मारना।
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सिरवार  : पुं० [हिं० सिर+कार] जमींदार का वह कारिंदा जो उसकी खेती का प्रबंध करता है। पुं०=सिवार।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरस  : पुं० [सं० शिरीष] शीशम की तरह का लंबा एक प्रकार का ऊँचा पेड़।
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सिरसा  : पुं०=सिरस।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरसी  : पुं० [देश०] एक प्रकार का तीतर।
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सिरहर  : वि० [हिं० सिर+हर] शिरोमणि। वि०=सिर-धरा।
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सिरहाना  : पुं० [सं० शिरस्+आधान] १. तकिया जिसे सिर के नीचे रखते हैं। (पश्चिम) २. खाट या पलंग का वह स्थान जहाँ तकिया (सोते समय) साधारणतया रखते हैं।
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सिराँचा  : पुं० [देश०] एक प्रकार का पतला बाँस जिससे कुरसियाँ और मोढ़े बनते हैं।
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सिरा  : पुं० [हिं० सिर] १. किसी चीज के सिर या ऊपरी भाग का अंतिम अंश। शीर्ष भाग। जैसे—सिरे की चमेली। २. किसी लंबी चीज के दोनों छोरों या अंतिम अंशों में से हर एक। जैसे—उनकी दुकान बाजार के इस सिरे पर और मकान उस सिरे पर है। ३. किसी काम, चीज या बात का वह अंतिम अंश जो उसकी समाप्ति का सूचक होता है। पद-सिरे का=सबसे बढ़ा-चढ़ा। उच्च कोटि या प्रथम श्रेणी का। मुहा०—(किसी काम या बात का) सिरे चढ़ना=ठीक तरह से पूर्णता या समाप्ति तक पहुँचना। ४. आरंभ का भाग। शुरू का हिस्सा। जैसे—अब यह काम नये सिरे से करना पड़ेगा। ५. किसी चीज के आगे या सामने का भाग। स्त्री० [सं० शिरा] १. रक्त नाड़ी। २. सिंचाई की नाली। खेत की सिंचाई। ४. पानी की पतली धार। पुं० पानी रखने का कलसा या गगरा।
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सिराज  : पुं० [अं०] १. सूर्य। २. दीपक। चिराग।
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सिराजी  : वि०, पुं०=शीराजी।
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सिराना  : अ० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़, पुं० हि० सीयर, सीरा] १. ठंडा या शीतल होना। २. धीमा या मंद होना। ३. तृप्त होना। स० [हिं० सीरा=शीतल] १. ठंड़ा या शीतल करना। २. धीमा या मंद करना। ३. धार्मिक अवसरों पर गेहूँ जौं आदि की उगाई हुई बालें, या पत्तियाँ किसी जलाशय या नदी में ले जाकर प्रवाहित करना। ४. तृप्त करना। ५. गाड़ना। अ० [हिं० सिरा] १. सिरे अर्थात पूर्णता या समाप्ति तक पहुँचना। २. खतम होना। न रह जाना। ३. गुजरना। बीतना। ४. निपटना। तै होना। स० [हिं० सिरा] १. सिरे अर्थात पूर्णता या समाप्ति तक पहुँचाना। समाप्त करना। २. बनाकर तैयार करना। ३. न रहने देना। नष्ट करना। उदा०—एहि विधि धरि मन धीर चीर अँसुवन सिराई कै।—नन्ददास। ४. समय गुजारना। बिताना। ५. तै करना। निपटाना।
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सिरापत्र  : पुं० [सं०] १. पीपल। अश्वस्थ। २. एक प्रकार की खजूर।
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सिरामूल  : पुं० [सं०] नाभि।
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सिरा-मोक्ष  : पुं० [सं०] शरीर का दूषित रक्त निकलवाना। फसद खुलवाना।
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सिरार  : स्त्री० [हिं० सिरा] पाई के सिरे पर लगाई जाने वाली लकड़ी। (जुलाहे)(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिराल  : वि० [सं० सिरा+लच्] १. शिराओं से युक्त। २. जिसमें लंबी या बहुत-सी शिराएँ हों।
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सिरालक  : पुं० [सं० सिराल+कन्] एक प्रकार का अंगूर।
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सिराला  : स्त्री० [सं० सिराल+टाप्] १. एक प्रकार का पौधा। २. कमरख।
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सिराली  : स्त्री० [हिं० सिर] मोर की कलगी। मयूर-शिखा।
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सिरालु  : वि० [सं० सिरा+आलुच्] शिराओं वाला। सिराल।
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सिरावन  : वि० [हिं० सिराना] १. ठंड़ा या शीतल करने वाला। २. संताप दूर करने वाला। पुं० सिराने की क्रिया या भाव। (पूरब) पुं० [सं० सीर=हल] हेंगा।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरावना  : स०=सिराना। वि०=सिरावन।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिराहर्ष  : पुं० [सं०] १. पुलक। रोमांच। २. आँखों के डोरो की लाली।
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सिरिख  : पुं०=सिरस वृक्ष।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरिन  : पुं० [देश०] लाल सिरस वृक्ष। रक्तवृक्ष।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरिफल  : पुं०=श्रीफल।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरियारी  : स्त्री० [सं० शिरियारी] सुसना का साग। हाथी शुंडी।
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सिरिश्ता  : पुं०=सरिश्ता (विभाग)।
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सिरिश्तेदार  : पुं०=सरिश्तेदार।
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सिरी  : स्त्री० [सं० सिर+ङीष्] १. करघा। २. कलिहारी। लांगली। स्त्री० [सं० श्री] १. लक्ष्मी। २. शोभा। ३. रोली। स्त्री० [हिं० सिर] १. सिर पर पहनने का एक गहना। २. सिर का अल्पा रूप। छोटा सिर। ३. काटी या मारी हुई बकरी, मछली, मुरगी आदि के गले के ऊपर का सारा अंश जो बहुत चाव से खाया जाता है।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरीस  : पुं०=सिरस (वृक्ष)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरी-साफ  : पुं० [?] एक प्रकार की मखमल।
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सिरेयस  : पुं०=श्रेयस।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरोना  : पुं० [हिं० सिर+ओना] इंडुरी। (दे०)
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सिरोपाव  : पुं० [हिं० सिर+पाँव] सिर से पैर तक पहनने के सब कपड़े, (अंगा, पगड़ी, पजामा, पटका और दुपट्टा) जो राज दरबार से किसी को सम्मान के रूप में दिया जाता है। खिलअत।
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सिरोमनि  : पुं०=शिरोमणि।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरोरूह  : पुं०=शिरोरूह (बाल)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिरोही  : पुं० [?] राजपूताने का एक नगर जहाँ की बनी हुई तलवार बहुत ही लचीली और बढ़िया होती है। स्त्री० तलवार, विशेषतः उक्त नगर की बनी हुई तलवार। स्त्री० [देश०] काले रंग की एक चिड़िया जिसकी चोंच और पंजे लाल रंग के होते हैं।
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सिर्का  : पुं०=सिरका।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सिर्फ  : अव्य० [अ० सिर्फ] १. किसी निश्चित तथा निर्दिष्ट परिमाण या मात्रा में। जैसे—(क) सिर्फ दस आदमी वहाँ गये थे। (ख) सिर्फ दो सेर मिठाई भेजी गई है। २. बस इतना ही या यही, और कुछ नहीं। जैसे—मैं सिर्फ कह ही सकता था। वि० अकेला।
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