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सूली  : स्त्री० [सं० शूल] १. प्राणदंड की एक प्राचीन प्रणाली जिसमें दंडित मनुष्य एक नुकीले लोहे के डंडे पर बैठा दिया जाता था और उसके सिर पर मुँगरे से आघात किया जाता था। इससे नीचे से ऊपर तक उसका सारा शरीर छिद जाता था और वह मर जाता था। क्रि० प्र०–चढ़ना।–चढ़ाना।–देना।–पाना।–मिलना। २. आज—कल फाँसी नामक प्राणदंड। ३. बहुत अधिक कष्ट या पीड़ा की स्थिति। मुहा०–प्राण सूली पर टँगा रहना=किसी प्रकार की दुबधा में पड़ने के कारण बहुत अधिक मानसिक कष्ट होना। जैसे–जब तक लड़का लौटकर नहीं आया था, तब तक प्राण सूली पर टँगे थे। ३. एक प्रकार का नरम लोहा जिसके छड़ बनाये जाते हैं। (लुहार) ४. दक्षिण दिशा। (लश०) पुं० =शूली (शिव)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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